विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 757, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३५
बारंबार नृत्य करते हुए उस दानवकी ओर देखकर भक्त-वत्सल भगवान् शिव करुणाके वशीभूत हो इस प्रकार बोले ॥ १४७-१४८ ॥
ईश्वर उवाच
वरं वृणीष्व बाण त्वं मनसा यदभीप्ससि।
प्रसादसुमुखस्तेऽहं प्रियोऽसि मम दानव ॥ १४९॥
श्रीमहादेवजीने कहा— बाण ! तुम अपने मनसे जो चाहते हो, वह वर मुझसे माँगो। मैं तुमपर कृपा करनेके लिये प्रसन्न हुआ हूँ। दानव ! तुम मेरे प्रिय हो ॥ १४९ ॥
बाण उवाच
अजश्चामरश्चैव भवेयं सततं विभो।
एष मे प्रथमो देव वरोऽस्तु यदि मन्यसे ॥ १५०॥
बाणासुर बोला— सर्वव्यापी देव ! मैं सदा अजर और अमर रहूँ, यदि आप स्वीकार करें तो मेरे लिये यही प्रथम वर हो ॥ १५० ॥
देव उवाच
तुल्योऽसि दैवतैर्बाण न मृत्युस्तव विद्यते ।
अथापरं वृणीष्वाद्य अनुग्राह्योऽसि मे सदा ॥ १५१॥
श्रीमहादेवजीने कहा— बाणासुर ! तुम देवताओंके तुल्य हो, तुम्हारे लिये मृत्यु नहीं है। अब कोई दूसरा वर माँगो; क्योंकि तुम सदा मेरे कृपापात्र हो ॥ १५१ ॥
बाण उवाच
यथाहं शोणितैर्दिग्धो भृशार्तो व्रणपीडितः।
भक्तानां नृत्यतां देव पुत्रजन्म भवेद्भव ॥ १५२॥
बाणासुर बोला— भगवन् ! मैं अत्यन्त आर्त, घावसे पीड़ित और खूनसे लथपथ हूँ। तथापि जिस प्रकार नृत्य कर रहा हूँ, इस तरह नृत्य करनेवाले भक्तोंके यहाँ पुत्रजन्म-का उत्सव हो ॥ १५२ ॥
श्रीहर उवाच
निराहाराः क्षमावन्तः सत्यार्जवसमाहिताः।
मद्भक्ता येऽपि नृत्यन्ति तेषामेवं भविष्यति ॥ १५३॥
श्रीमहादेवजीने कहा— जो मेरे भक्तजन निराहार, क्षमाशील तथा सत्य और सरलतासे संयुक्त रहकर एकाग्र-चित्त हो मेरी प्रसन्नताके लिये नृत्य करेंगे, उन्हें ऐसा ही फल प्राप्त होगा ॥ १५३ ॥
तृतीयं त्वमथो बाण वरं वर मनोगतम्।
तद् विधास्यामि ते पुत्र सफलोऽस्तु भवानिह ॥ १५४॥
'बेटा बाणासुर ! अब तुम कोई तीसरा मनोवाञ्छित वर माँगो, मैं उसे पूर्ण करूँगा; मेरी कृपासे तुम यहाँ सफलमनोरथ होओ ॥ १५४ ॥
बाण उवाच
चक्रताडनजा घोरा रुजा तीव्रा हि मेऽनघ।
वरेणासौ तृतीयेन शान्तिं गच्छतु मे भव ॥ १५५॥
बाणासुर बोला— निष्पाप महादेव ! चक्रके आघातसे मुझे बड़ी भयंकर एवं तीव्र वेदना हो रही है, आपके दिये हुए तीसरे वरसे मेरी वह पीड़ा शान्त हो जाय ॥ १५५ ॥
श्रीरुद्र उवाच
एवं भवतु भद्रं ते न रुजा प्रभविष्यति।
अक्षतं तव गात्रं तु स्वस्थावस्थं भविष्यति ॥ १५६॥
श्रीमहादेवजी बोले— वत्स ! ऐसा ही हो। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हें पीड़ा नहीं होगी। तुम्हारा शरीर घाव-से रहित और स्वस्थ हो जायगा ॥ १५६ ॥
चतुर्थं ते वरं दद्मि वृणीष्व यदि काङ्क्षसि।
न तेऽहं विमुखस्तात प्रसादसुमुखो ह्यहम् ॥ १५७॥
तात ! अब मैं तुम्हें चौथा वर देता हूँ; यदि चाहो तो माँग लो। मैं तुमसे विमुख नहीं हूँ। तुमपर कृपा करनेके लिये सदा ही प्रसन्नमुख हूँ ॥ १५७ ॥
बाण उवाच
प्रमथगणवंशस्य प्रथमः स्यामहं विभो।
महाकाल इति ख्यातिं गच्छेयं शाश्वतीः समाः ॥ १५८॥
बाणासुर बोला— प्रभो ! मैं आपके प्रमथगणोंके समुदायका प्रमुख व्यक्ति होऊँ और महाकालके नामसे मेरी नित्य निरन्तर ख्याति बनी रहे ॥ १५८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं भविष्यतीत्याह बाणं देवो महेश्वरः।
दिव्यरूपोऽक्षतो गात्रैर्नीरोगस्तु ममाश्रयात् ॥ १५९॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! तब महेश्वरदेवने बाणासुर-से कहा—'बाण ! ऐसा ही होगा, तुम मेरा आश्रय ग्रहण करनेके कारण शरीरसे अक्षत और नीरोग रहोगे। तुम्हारा रूप दिव्य हो जायगा ॥ १५९ ॥
ममातिसर्गाद् बाण त्वं भव चैवाकुतोभयः।
भूयस्ते पञ्चमं दद्मि प्रख्यातबलपौरुष।
पुनर्वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते ॥ १६०॥
'विख्यात बल और पौरुषसे युक्त बाणासुर ! तुम मेरे दिये हुए वरके प्रभावसे निर्भय हो जाओ; तुम्हे कहींसे कोई भय न रहे। अब मैं तुम्हे पुनः पाँचवाँ वर देता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार फिर कोई वर माँगो' ॥ १६०॥