भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 150 में से

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हिन्द स्वराज्य ओर देखिए। उन्होंने अपना जीवन हिन्द को अर्पण कर दिया है। उनसे यह सबक हमने सीखा। हिन्द का खून अंग्रेजों ने चूस लिया है, यह सिखाने वाले माननीय दादाभाई हैं। आज उन्हें अंग्रेजों पर भरोसा है उससे क्या ? हम जवानी के जोश में एक कदम आगे रखते हैं, इससे क्या दादाभाई कम पूज्य हो जाते हैं ? इससे क्या हम ज्यादा ज्ञानी हो गये ? जिस सीढ़ी से हम ऊपर चढ़े उसको लात न मारने में ही बुद्धिमानी है। अगर वह सीढ़ी निकाल दें तो सारी निसैनी (सीढ़ी) गिर जाए, यह हमें याद रखना चाहिए। हम बचपन से जवानी में आते हैं तब बचपन से नफरत नहीं करते, बल्कि उन दिनों को प्यार से याद करते हैं। बरसों तक अगर मुझे कोई पढ़ाता है और उससे मेरी जानकारी जरा बढ़ जाती है, तो इससे मैं अपने शिक्षक से ज्यादा ज्ञानी जिस सीढ़ी से हम ऊपर नहीं माना जाऊंगा, अपने शिक्षक को तो मुझे मान चढ़े उसको लात न देना ही पड़ेगा। इसी तरह हिन्द के दादा के बारे में मारने में ही बुद्धिमानी समझाना चाहिए। उनके पीछे सारी हिन्दुस्तानी जनता है। अगर वह सीढ़ी है, यह तो हमें कहना ही पड़ेगा। निकाल दें तो सारी पाठक : यह आपने ठीक कहा। दादाभाई नौरोजी की निसैनी (सीढ़ी) गिर इज्जत करना चाहिए, यह तो समझ सकते हैं। उन्होंने जाए, यह हमें याद और उनके जैसे दूसरे पुरुषों ने जो काम किये हैं, रखना चाहिए। हम उनके बगैर हम आज का जोश महसूस नहीं कर पाते, बचपन से जवानी में यह बात ठीक लगती है, लेकिन यही बात प्रोफेसर आते हैं तब बचपन से गोखले साहब के बारे में हम कैसे मान सकते हैं ? वे नफरत नहीं करते, तो अंग्रेजों के बड़े भाईबंद बनकर बैठे हैं, वे तो कहते बल्कि उन दिनों को हैं कि अंग्रेजों से हमें बहुत कुछ सीखना है। अंग्रेजों प्यार से याद करते हैं। की राजनीति से हम वाकिफ़ हो जाएँ, तभी स्वराज्य की बातचीत की जाए। उन साहब के भाषणों से तो मैं ऊब गया हूँ। संपादक : आप ऊब गये हैं, यह दिखाता है कि आपका मिज़ाज उतावला है, लेकिन जो नौजवान अपने माँ-बाप के ठंडे मिज़ाज से ऊब जाते हैं और वे (माँ-बाप) अगर अपने साथ न दौड़ें तो गुस्सा होते हैं, वे अपने माँ-बाप का अनादर करते हैं ऐसा हम समझते हैं। प्रोफेसर गोखले के बारे में भी ऐसा ही समझना चाहिए। क्या हुआ अगर प्रोफेसर गोखले हमारे साथ नहीं दौड़ते हैं ? स्वराज्य भुगतने की इच्छा रखने वाली प्रजा अपने बुजुर्गों का तिरस्कार 15