हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
अध्याय १-५: कांग्रेस, बंग-भंग व स्वराज्य का वास्तविक अर्थ
हिन्द स्वराज्य ओर देखिए। उन्होंने अपना जीवन हिन्द को अर्पण कर दिया है। उनसे यह सबक हमने सीखा। हिन्द का खून अंग्रेजों ने चूस लिया है, यह सिखाने वाले माननीय दादाभाई हैं। आज उन्हें अंग्रेजों पर भरोसा है उससे क्या ? हम जवानी के जोश में एक कदम आगे रखते हैं, इससे क्या दादाभाई कम पूज्य हो जाते हैं ? इससे क्या हम ज्यादा ज्ञानी हो गये ? जिस सीढ़ी से हम ऊपर चढ़े उसको लात न मारने में ही बुद्धिमानी है। अगर वह सीढ़ी निकाल दें तो सारी निसैनी (सीढ़ी) गिर जाए, यह हमें याद रखना चाहिए। हम बचपन से जवानी में आते हैं तब बचपन से नफरत नहीं करते, बल्कि उन दिनों को प्यार से याद करते हैं। बरसों तक अगर मुझे कोई पढ़ाता है और उससे मेरी जानकारी जरा बढ़ जाती है, तो इससे मैं अपने शिक्षक से ज्यादा ज्ञानी जिस सीढ़ी से हम ऊपर नहीं माना जाऊंगा, अपने शिक्षक को तो मुझे मान चढ़े उसको लात न देना ही पड़ेगा। इसी तरह हिन्द के दादा के बारे में मारने में ही बुद्धिमानी समझाना चाहिए। उनके पीछे सारी हिन्दुस्तानी जनता है। अगर वह सीढ़ी है, यह तो हमें कहना ही पड़ेगा। निकाल दें तो सारी पाठक : यह आपने ठीक कहा। दादाभाई नौरोजी की निसैनी (सीढ़ी) गिर इज्जत करना चाहिए, यह तो समझ सकते हैं। उन्होंने जाए, यह हमें याद और उनके जैसे दूसरे पुरुषों ने जो काम किये हैं, रखना चाहिए। हम उनके बगैर हम आज का जोश महसूस नहीं कर पाते, बचपन से जवानी में यह बात ठीक लगती है, लेकिन यही बात प्रोफेसर आते हैं तब बचपन से गोखले साहब के बारे में हम कैसे मान सकते हैं ? वे नफरत नहीं करते, तो अंग्रेजों के बड़े भाईबंद बनकर बैठे हैं, वे तो कहते बल्कि उन दिनों को हैं कि अंग्रेजों से हमें बहुत कुछ सीखना है। अंग्रेजों प्यार से याद करते हैं। की राजनीति से हम वाकिफ़ हो जाएँ, तभी स्वराज्य की बातचीत की जाए। उन साहब के भाषणों से तो मैं ऊब गया हूँ। संपादक : आप ऊब गये हैं, यह दिखाता है कि आपका मिज़ाज उतावला है, लेकिन जो नौजवान अपने माँ-बाप के ठंडे मिज़ाज से ऊब जाते हैं और वे (माँ-बाप) अगर अपने साथ न दौड़ें तो गुस्सा होते हैं, वे अपने माँ-बाप का अनादर करते हैं ऐसा हम समझते हैं। प्रोफेसर गोखले के बारे में भी ऐसा ही समझना चाहिए। क्या हुआ अगर प्रोफेसर गोखले हमारे साथ नहीं दौड़ते हैं ? स्वराज्य भुगतने की इच्छा रखने वाली प्रजा अपने बुजुर्गों का तिरस्कार 15
हिन्द स्वराज्य नहीं कर सकती। अगर दूसरे की इज़्ज़त करने की आदत हम खो बैठें, तो हम निकम्मे हो जाएँगे। जो प्रौढ़ और तजुरबेकार हैं, वे ही स्वराज्य भुगत सकते हैं, न कि बे-लगाम लोग। और देखिये कि जब प्रोफेसर गोखले ने हिन्दुस्तान की शिक्षा के लिए त्याग किया तब ऐसे कितने हिन्दुस्तानी थे? मैं तो खासतौर पर मानता हूँ कि प्रोफेसर गोखले जो कुछ भी करते हैं वह शुद्ध भाव से और हिन्दुस्तान का हित मानकर करते हैं। हिन्द के लिए अगर अपनी जान भी देनी पड़े तो वे दे देंगे, ऐसी हिन्द के लिए उनकी भक्ति है। वे जो कुछ कहते हैं वह किसी की खुशामद करने के लिए नहीं, बल्कि सही मानकर कहते हैं। इसलिए हमारे मन में उनके लिए पूज्य भाव होना चाहिए। [हाशिया / साइड नोट:] सारे के सारे अंग्रेज बुरे हैं, ऐसा तो मैं नहीं मानूँगा। बहुत से अंग्रेज चाहते हैं कि हिन्दुस्तान को स्वराज्य मिले। उस प्रजा में स्वार्थ ज्यादा है यह ठीक है, लेकिन उससे हर एक अंग्रेज बुरा है ऐसा साबित नहीं होता। पाठक : तो क्या वे साहब जो कहते हैं उसके मुताबिक हमें भी करना चाहिए? संपादक : मैं ऐसा कुछ नहीं कहता। अगर हम शुद्ध बुद्धि से अलग राय रखते हैं तो उस राय के मुताबिक चलने की सलाह खुद प्रोफेसर साहब हमें देंगे। हमारा मुख्य काम तो यह है कि हम उनके कामों की निन्दा न करें, हमसे वे महान हैं ऐसा मानें और यकीन रखें कि उनके मुकाबले में हमने हिन्द के लिए कुछ भी नहीं किया है। उनके बारे में कुछ अखबार जो अशिष्टतापूर्वक लिखते हैं उसकी हमें निन्दा करनी चाहिए और प्रोफेसर गोखले जैसों को हमें स्वराज्य के स्तंभ मानना चाहिए। उनके ख़्याल ग़लत और हमारे ही सही हैं, या हमारे ख़्याल के मुताबिक़ न बरतने वाले देश के दुश्मन हैं, ऐसा मान लेना बुरी भावना है। पाठक : आप जो कुछ कहते हैं वह अब मेरी समझ में कुछ आता है। फिर भी मुझे उसके बारे में सोचना होगा। पर मि. ह्यूम, सर विलियम वेडरबर्न वगैरा के बारे में आपने जो कहा उसमें तो हद हो गई। संपादक : जो नियम हिन्दुस्तानियों के बारे में है, वही अंग्रेजों के बारे में समझना चाहिए। सारे के सारे अंग्रेज बुरे हैं, ऐसा तो मैं नहीं मानूँगा। बहुत से अंग्रेज चाहते हैं कि हिन्दुस्तान को स्वराज्य मिले। उस प्रजा में स्वार्थ ज्यादा है यह ठीक है, लेकिन उससे हर एक अंग्रेज बुरा है ऐसा साबित नहीं 16
हिन्द स्वराज्य होता। जो हक, न्याय चाहते हैं, उन्हें सबके साथ न्याय करना होगा। सर विलियम हिन्दुस्तान का बुरा चाहने वाले नहीं हैं, इतना हमारे लिये काफी है। ज्यों-ज्यों हम आगे बढ़ेंगे त्यों-त्यों आप देखेंगे कि अगर हम न्याय की भावना से काम लेंगे, तो हिन्दुस्तान का छुटकारा जल्दी होगा। आप यह भी देखेंगे कि अगर हम तमाम अंग्रेजों से द्वेष करेंगे, तो उससे स्वराज्य दूर ही जाने वाला है, लेकिन अगर उनके साथ भी न्याय करेंगे, तो स्वराज्य के लिए हमें उसकी मदद मिलेगी। पाठक : अभी तो ये सब मुझे फिजूल की बड़ी-बड़ी बातें लगती हैं। अंग्रेजों की मदद मिले और उससे स्वराज्य मिल जाए, मुझे दिखाना तो इतना ही है ये तो आपने दो उलटी बातें कहीं, लेकिन इस कि कांग्रेस ने हिन्द को सवाल का हल अभी मुझे नहीं चाहिए। उसमें स्वराज्य का रस चखाया। समय बिताना बेकार है। स्वराज्य कैसे मिलेगा, इसका जस कोई और लेना यह जब आप बताएँगे तब शायद आपके विचार चाहे तो वह ठीक न होगा मैं समझ सकूँ तो समझ सकूँ। फिलहाल तो और हम भी ऐसा मानें तो अंग्रेजों की मदद की आपकी बात ने मुझे शंका बेक़दर ठहरेंगे। इतना ही नहीं, में डाल दिया है और आपके विचारों के बल्कि जो मक़सद हम ख़िलाफ मुझे भरमा दिया है। इसलिए यह बात हासिल करना चाहते हैं उसमें आप आगे न बढ़ाएँ तो अच्छा हो। मुसीबतें पैदा होंगी। संपादक : मैं अंग्रेजों की बात को बढ़ाना नहीं चाहता। आप शंका में पड़ गये, इसकी कोई फिकर नहीं। मुझे जो महत्त्व की बात कहनी है, उसे पहले से ही बता देना ठीक होगा। आपकी शंका को धीरज से दूर करना मेरा फर्ज है। पाठक : आपकी यह बात मुझे पसन्द आयी। इससे मुझे जो ठीक लगे वह बात कहने की मुझमें हिम्मत आई है। अभी मेरी एक शंका रह गई है। कांग्रेस के आरम्भ से स्वराज्य की नींव पड़ी, यह कैसे कहा जा सकता है ? संपादक : देखिए, कांग्रेस ने अलग-अलग जगहों पर हिन्दुस्तानियों को इकट्ठा करके उनमें ‘हम एक-राष्ट्र हैं’ ऐसा जोश पैदा किया। कांग्रेस पर सरकार की कड़ी नज़र रहती थी। महसूल का हक प्रजा को होना चाहिए, ऐसी माँग कांग्रेस ने हमेशा की है। जैसा स्वराज्य कैनेडा में है वैसा स्वराज्य कांग्रेस ने हमेशा चाहा है। वैसा स्वराज्य मिलेगा या नहीं मिलेगा, वैसा 17
हिन्द स्वराज स्वराज्य हमें चाहिए या नहीं चाहिए, उससे बढ़कर दूसरा कोई स्वराज्य है या नहीं, यह सवाल अलग है। मुझे दिखाना तो इतना ही है कि कांग्रेस ने हिन्द को स्वराज्य का रस चखाया। इसका जस कोई और लेना चाहे तो वह ठीक न होगा और हम भी ऐसा मानें तो बेक़दर ठहरेंगे। इतना ही नहीं, बल्कि जो मक़सद हम हासिल करना चाहते हैं उसमें मुसीबतें पैदा होंगी। कांग्रेस को अलग समझने और स्वराज्य के ख़िलाफ मानने से हम उसका उपयोग नहीं कर सकते। 18
कोई भी संकल्प मामूली नहीं होता। गंभीरता से निभाने से उसका परिणाम अवश्य मिलता है। 19
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बंग-भंग पाठक : आप कहते हैं उस तरह विचार करने पर यह ठीक लगता है कि कांग्रेस ने स्वराज्य की नींव डाली, लेकिन यह तो आप मानेंगे कि वह सही जागृति नहीं थी। सही जागृति कब और कैसे हुई ? संपादक : बीज हमेशा हमें दिखाई नहीं देता। वह अपना काम ज़मीन के नीचे करता है और जब ख़ुद मिट जाता है तब पेड़ ज़मीन के ऊपर देखने में आता है। कांग्रेस के बारे में ऐसा ही समझिए। जिसे आप सही जागृति मानते हैं वह तो बंग-भंग से हुई, जिसके लिए हम लॉर्ड कर्ज़न के आभारी हैं। बंग- भंग के वक्त बंगालियों ने कर्ज़न साहब से बहुत प्रार्थना की, लेकिन वे साहब अपनी सत्ता के मद में लापरवाह बीज हमेशा हमें दिखाई रहे। उन्होंने मान लिया कि हिन्दुस्तानी लोग सिर्फ नहीं देता। वह अपना बकवास ही करेंगे, उनसे कुछ भी नहीं होगा। उन्होंने काम ज़मीन के नीचे अपमान भरी भाषा का प्रयोग किया और ज़बरदस्ती करता है और जब ख़ुद बंगाल के टुकड़े किए। हम यह मान सकते हैं कि उस मिट जाता है तब दिन से अंग्रेज़ी राज्य के भी टुकड़े हुए। बंग-भंग से पेड़ ज़मीन के ऊपर जो धक्का अंग्रेज़ी हुकूमत को लगा, वैसा और किसी देखने में आता है। काम से नहीं लगा। इसका मतलब यह नहीं कि जो दूसरे गैर इन्साफ़ हुए, वे बंग-भंग से कुछ कम थे। नमक महसूल कुछ कम गैर इन्साफ़ नहीं है। ऐसा और तो आगे हम बहुत देखेंगे, लेकिन बंगाल के टुकड़े करने का विरोध करने के लिए प्रजा तैयार थी। उस वक्त प्रजा की भावना बहुत तेज़ थी। उस समय बंगाल के बहुतेरे नेता अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थे। अपनी सत्ता, अपनी ताक़त को वे जानते थे। इसलिए तुरन्त आग भड़क उठी। अब वह बुझने वाली नहीं है, उसे बुझाने की ज़रूरत भी नहीं है। ये टुकड़े क़ायम नहीं रहेंगे, बंगाल फिर एक हो जाएगा, लेकिन अंग्रेज़ी जहाज़ में जो दरार पड़ी है, वह तो हमेशा रहेगी ही। वह दिन-ब-दिन चौड़ी होती जाएगी। जागा हुआ हिन्द फिर सो जाए, वह नामुमकिन है। बंग-भंग को रद्द करने की माँग स्वराज्य की माँग के बराबर है। बंगाल के नेता यह बात खूब जानते हैं। अंग्रेज़ी हुकूमत भी यह बात समझती है, इसीलिए टुकड़े रद्द नहीं हुए। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं, त्यों- 21
हिन्द स्वराज्य त्यों प्रजा तैयार होती जाती है। प्रजा एक दिन में नहीं बनती, उसे बनने में कई बरस लग जाते हैं। पाठक : बंग-भंग के नतीजे आपने क्या देखे ? संपादक : आज तक हम मानते आये हैं कि बादशाह से अर्ज करना चाहिए और वैसा करने पर भी दाद न मिले तो दुःख सहन करना चाहिए, अलबत्ता अर्ज तो करते ही रहना चाहिए बंगाल के टुकड़े होने के बाद लोगों ने देखा कि हमारी अर्ज के पीछे कुछ ताक़त चाहिए, लोगों में कष्ट सहन करने की शक्ति चाहिए। यह नया जोश टुकड़े होने का अहम नतीजा माना जाएगा। यह जोश अखबारों के लेखों में दिखाई दिया। लेख कड़े होने लगे। जो बात लोग डरते हुए या चोरी-चुपके करते थे, वह खुल्मखुल्ला होने और लिखी जाने लगी। स्वदेशी का आन्दोलन चला। अंग्रेजों को देखकर छोटे-बड़े सब भागते थे, पर अब नहीं डरते, मार-पीट से भी नहीं डरते, जेल जाने में भी उन्हें कोई हर्ज नहीं मालूम होता और हिन्द के पुत्र रत्न आज देश निकाला भुगतते हुए विदेशों में विराजमान हैं। यह चीज उस अर्ज से अलग है। यों लोगों में खलबली मच रही है। बंगाल की हवा उत्तर में पंजाब तक और दक्षिण में मद्रास में कन्याकुमारी तक पहुँच गई है। पाठक : इसके अलावा और कोई जानने लायक नतीजा आपको सूझता है ? संपादक : बंग-भंग से जैसे अंग्रेजी जहाज़ में दरार पड़ी है, वैसे ही हममें भी दरार फूट पड़ी है। बड़ी घटनाओं के परिणाम भी यों बड़े ही होते हैं। हमारे नेताओं में दो दल हो गये हैं: एक मॉडरेट और दूसरा एक्स्ट्रीमिस्ट। उनको हम ‘धीमे’ और ‘उतावले’ कह सकते हैं। (‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ शब्द भी चलते हैं।) कोई मॉडरेट को डरपोक पक्ष और एक्स्ट्रीमिस्ट को हिम्मतवाला पक्ष भी कहते हैं। सब अपने-अपने ख़्यालों के मुताबिक इन दो शब्दों का अर्थ करते हैं। यह सच है कि ये जो दल हुए हैं, उनके बीच ज़हर भी पैदा हुआ है। एक दल दूसरे का भरोसा नहीं करता, दोनों एक-दूसरे को ताना मारते हैं। सूरत कांग्रेस के समय करीब-करीब मार-पीट भी हो गई। ये जो दो दल हुए हैं वह देश के लिए अच्छी निशानी नहीं हैं, ऐसा मुझे तो लगता है, लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि ऐसे दल लम्बे अरसे तक टिकेंगे नहीं। इस तरह कब तक ये दल रहेंगे, यह तो नेताओं पर आधार रखता है। 22
मैं दुनिया में सिर्फ एक ही तानाशाह को स्वीकार करता हूं और वह है मेरी अन्तरात्मा की आवाज़
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अशांति और असंतोष पाठक : तो आपने बंग-भंग को जागृति का कारण माना। उससे फैली हुई अशांति को ठीक समझा जाए या नहीं ? संपादक : इन्सान नींद में से उठता है तो अंगड़ाई लेता है, इधर-उधर घूमता है और अशान्त रहता है। उसे पूरा भान आने में कुछ वक्त लगता है। उसी तरह अगर ये बंग-भंग से जागृति आई है, फिर भी बेहोशी नहीं गई है। अभी हम जब तक आदमी अपनी चालू अंगड़ाई लेने की हालत में हैं। हालत में खुश रहता है, तब अभी अशान्ति की हालत है। जैसे नींद तक उसमें से निकलने के और जाग के बीच की हालत ज़रूरी मानी लिए उसे समझाना मुश्किल जानी चाहिए और इसलिए वह ठीक कही है। इसलिए हर एक सुधार के जाएगी, वैसे बंगाल में और उस कारण से पहले असंतोष होना ही हिन्दुस्तान में जो अशान्ति फैली है वह भी चाहिए। चालू चीज से ऊब ठीक है। अशान्ति है यह हम जानते हैं, जाने पर ही उसे फेंक देने को इसलिए शान्ति का समय आने की शक्यता मन करता है। ऐसा असंतोष है। हममें महान हिन्दुस्तानियों की नींद से उठने के बाद हमेशा अंगड़ाई लेने और अंग्रेजों की पुस्तकें की हालत में हम नहीं रहते, लेकिन देर-सबेर पढ़कर पैदा हुआ है। उस अपनी शक्ति के मुताबिक पूरे जागते ही हैं। असंतोष से अशान्ति पैदा हुई इसी तरह इस अशान्ति में से हम ज़रूर छूटेंगे। और उस अशान्ति में कई अशान्ति किसी को नहीं भाती। लोग मरे, कई बरबाद हुए। पाठक : अशान्ति का दूसरा रूप क्या है ? संपादक : अशान्ति असल में असंतोष है। उसे आजकल हम ‘अनरेस्ट’ कहते हैं। कांग्रेस के जमाने में वह ‘डिस्कन्टेन्ट’ कहलाता था। मि. ह्यूम हमेशा कहते थे कि हिन्दुस्तान में असंतोष फैलाने की ज़रूरत है। यह असंतोष बहुत उपयोगी चीज है। जब तक आदमी अपनी चालू हालत में खुश रहता है, तब तक उसमें से निकलने के लिए उसे समझाना मुश्किल है। इसलिए हर एक सुधार के पहले 25
हिन्द स्वराज इन्सान नींद में से उठता है तो अंगड़ाई लेता है, इधर- उधर घूमता है और अशान्त रहता है। उसे पूरा भान आने में कुछ वक्त लगता है। उसी तरह अगर ये बंग- भंग से जागृति आई है, फिर भी बेहोशी नहीं गई है। अभी हम अंगड़ाई लेने की हालत में हैं। असंतोष होना ही चाहिए। चालू चीज से ऊब जाने पर ही उसे फेंक देने को मन करता है। ऐसा असंतोष हममें महान हिन्दुस्तानियों की और अंग्रेज़ों की पुस्तकें पढ़कर पैदा हुआ है। उस असंतोष से अशान्ति पैदा हुई और उस अशान्ति में कई लोग मरे, कई बरबाद हुए, कई जेल गये, कई को दश निकाला हुआ। आगे भी ऐसा होगा और होना चाहिए। ये सब लक्षण अच्छे माने जा सकते हैं। इनका नतीजा बुरा भी आ सकता है। 26
बंदूक का भय गोली छूटने के साथ ही समाप्त हो जाता है, लेकिन प्रेम का बंधन हमेशा बढ़ता जाता है। 27
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स्वराज्य क्या है ? पाठक : कांग्रेस ने हिन्दुस्तान को एक राष्ट्र बनाने के लिए क्या किया, बंग- भंग से जागृति कैसे हुई ? अशान्ति और असंतोष कैसे फैले ? यह सब जाना । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि स्वराज्य के बारे में आपके क्या ख़्याल हैं । मुझे डर है कि शायद हमारी समझ में फ़र्क हो । संपादक : फ़र्क होना मुमकिन है । स्वराज्य के लिए आप-हम सब अधीर बन रहे हैं, लेकिन वह क्या है इस बारे में हम ठीक राय पर नहीं पहुँचे हैं। अंग्रेज़ों को निकाल बाहर करना चाहिए, यह विचार बहुतों के मुँह से सुना जाता है, लेकिन उन्हें क्यों निकालना चाहिए, इसका कोई ठीक ख़्याल किया गया हो ऐसा नहीं लगता । आपसे ही एक सवाल मैं पूछता हूँ। मान लीजिये कि हम माँगते हैं उतना सब अंग्रेज़ हमें दे दें तो फिर उन्हें यहाँ से निकाल देने की ज़रूरत आप समझते हैं ? [पार्श्व-उद्धरण:] मेहरबानी करके आप हमारे मुल्क से चले जाएँ। यह माँग वे कुबूल करें और हिन्दुस्तान से चले जाएँ, तब भी अगर कोई ऐसे अर्थ का अनर्थ करे कि वे यहीं रहते हैं, तो मुझे उसकी परवाह नहीं होगी। तब फिर हम ऐसा मानेंगे कि हमारी भाषा में कुछ लोग ‘जाना’ का अर्थ ‘रहना’ करते हैं। पाठक : मैं तो उनसे एक ही चीज माँगूँगा । वह है : मेहरबानी करके आप हमारे मुल्क से चले जाएँ। यह माँग वे कुबूल करें और हिन्दुस्तान से चले जाएँ, तब भी अगर कोई ऐसे अर्थ का अनर्थ करे कि वे यहीं रहते हैं, तो मुझे उसकी परवाह नहीं होगी। तब फिर हम ऐसा मानेंगे कि हमारी भाषा में कुछ लोग ‘जाना’ का अर्थ ‘रहना’ करते हैं। संपादक : अच्छा, हम मान लें कि हमारी माँग के मुताबिक अंग्रेज़ चले गये । उसके बाद आप क्या करेंगे ? पाठक : इस सवाल का जवाब अभी से ही दिया नहीं जा सकता । वे किस तरह जाते हैं, उस पर बाद की हालत का आधार रहेगा । मान लें कि आप कहते हैं, उस तरह वे चले गये, तो मुझे लगता है कि उनका बनाया हुआ 29
हिन्द स्वराज विधान हम चालू रखेंगे और राज का कारोबार चलाएँगे। कहने से ही वे चले जाएँ तो हमारे पास लश्कर तैयार ही होगा, इसलिए हमें राजकाज चलाने में कोई मुश्किल नहीं आयेगी। संपादक : आप भले ही ऐसा मानें, लेकिन मैं नहीं मानूँगा। फिर भी मैं इस बात पर ज्यादा बहस नहीं करना चाहता। मुझे तो आपके सवाल का जवाब देना है। वह जवाब मैं आपसे ही कुछ सवाल करके अच्छी तरह दे सकता हूँ। इसलिए कुछ सवाल आपसे करता हूँ। हम अंग्रेज़ों को क्यों निकालना चाहते हैं?
(बाएँ हाशिए का पाठ / Callout): यह सवाल ही बेकार है। बाघ अपना रूप पलट दे तो उसकी भाई बन्दी से कोई नुकसान है? ऐसा सवाल आपने पूछा, यह सिर्फ वक्त बरबाद करने के खातिर ही। अगर बाघ अपना स्वभाव बदल सके, तो अंग्रेज़ अपनी आदत छोड़ सकते हैं। जो कभी होने वाला नहीं है वह होगा, ऐसा मानना मनुष्य की रीत ही नहीं है।
पाठक : इसलिए कि उनके राज-कारोबार से देश कंगाल होता जा रहा है। वे हर साल देश से धन ले जाते हैं। वे अपनी ही चमड़ी के लोगों को बड़े ओहदे देते हैं, हमें सिर्फ गुलामी में रखते हैं, हमारे साथ बेअदबी का बरताव करते हैं और हमारी ज़रा भी परवाह नहीं करते। संपादक : अगर वे धन बाहर न ले जाएँ, नम्र बन जाएँ और हमें बड़े ओहदे दें, तो उनके रहने में आपको कुछ हर्ज है? पाठक : यह सवाल ही बेकार है। बाघ अपना रूप पलट दे तो उसकी भाईबन्दी से कोई नुकसान है? ऐसा सवाल आपने पूछा, यह सिर्फ वक्त बरबाद करने के खातिर ही। अगर बाघ अपना स्वभाव बदल सके, तो अंग्रेज़ अपनी आदत छोड़ सकते हैं। जो कभी होने वाला नहीं है वह होगा, ऐसा मानना मनुष्य की रीत ही नहीं है। संपादक : कैनेडा को जो राजसत्ता मिली है, बोअर लोगों को जो राजसत्ता मिली है, वैसी ही हमें मिले तो ? पाठक : यह भी बेकार सवाल है। हमारे पास उनकी तरह गोला बारूद हो तब वैसा ज़रूर हो सकता है, लेकिन उन लोगों के जितनी सत्ता जब अंग्रेज़ हमें देंगे तब हम अपना ही झंडा रखेंगे। जैसा जापान वैसा हिन्दुस्तान। अपना 30
हिन्द स्वराज्य जंगी बेड़ा, अपनी फौज और अपनी जाहोजलाली होगी और तभी हिन्दुस्तान का सारी दुनिया में बोलबाला होगा। संपादक : यह तो आपने अच्छी तस्वीर खींची। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें अंग्रेजी राज्य तो चाहिए, पर अंग्रेज (शासक) नहीं चाहिए। आप बाघ का स्वभाव तो चाहते हैं, लेकिन बाघ नहीं चाहते। मतलब यह हुआ कि आप हिन्दुस्तान को अंग्रेज बनाना चाहते हैं और हिन्दुस्तान जब अंग्रेज बन जाएगा तब वह हिन्दुस्तान नहीं कहा जाएगा, लेकिन सच्चा इंग्लिस्तान कहा जाएगा। यह मेरी कल्पना का स्वराज्य नहीं है। पाठक : मैंने तो जैसा मुझे सूझता है वैसा आप बाघ का स्वभाव तो स्वराज्य बतलाया। हम जो शिक्षा पाते हैं वह चाहते हैं, लेकिन बाघ नहीं अगर कुछ काम की हो, स्पेन्सर, मिल वगैरह चाहते। मतलब यह हुआ महान लेखकों के जो लेख हम पढ़ते हैं वे कुछ कि आप हिन्दुस्तान को काम के हों, अंग्रेज़ों की पार्लियामेन्ट अंग्रेज बनाना चाहते हैं और पार्लियामेन्टों की माता हो, तो फिर बेशक मुझे हिन्दुस्तान जब अंग्रेज बन तो लगता है कि हमें उनकी नकल करनी जाएगा तब वह हिन्दुस्तान चाहिए, वह यहाँ तक कि जैसे वे अपने मुल्क नहीं कहा जाएगा, लेकिन में दूसरों को घुसने नहीं देते वैसे हम भी दूसरों सच्चा इंग्लिस्तान कहा को न घुसने दें। जाएगा। यह मेरी कल्पना यों तो उन्होंने अपने देश में जो किया है, का स्वराज्य नहीं है। वैसा और जगह अभी देखने में नहीं आता। इसलिए उसे तो हमें अपने देश में अपनाना ही चाहिए, लेकिन अब आप अपने विचार बतलाइए। संपादक : अभी देर है। मेरे विचार अपने आप इस चर्चा में आपको मालूम हो जाएँगे। स्वराज्य को समझना आपको जितना आसान लगता है उतना ही मुझे मुश्किल लगता है। इसलिए फिलहाल मैं आपको इतना ही समझाने की कोशिश करूँगा कि जिसे आप स्वराज्य कहते हैं वह सचमुच स्वराज्य नहीं है 31
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एक आदर्श रास्ते की खोज में हम दिनों-दिन इंतज़ार करते रहते हैं कि शायद वह अब मिलेगा। मगर हम भूल जाते हैं कि रास्ते चलने के लिए बनाये जाते हैं। इंतज़ार के लिए नहीं। 33
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