भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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एक सिपाही तक का मुख्य कर्त्तव्य होना चाहिये। उसी मनोरथ और उत्साह से मरहठे विजय पर विजय प्राप्त करते हुए दिल्ली के फाटक तक ही नहीं, वरन् सिंध के किनारे तक तथा दक्षिण में समुद्र तक पहुँच गये। जिन का एकमात्र लक्ष्य भारत में एक विशाल हिन्दू साम्राज्य एवं हिंदु- पद-पादशाही स्थापित करना था, उन के किये हुए अमानुषीक कार्यों की कथाओं से वीररस प्रधान एक महा काव्य बन गया, जिसे हिन्दू माताएं अपने बच्चों को उन गीतों के स्थान पर सुना सकती हैं, जो कुछ समय पहले हमारे अधःपतन तथा हमारे ऊपर शत्रुओं के विजय प्राप्त करने की याद दिलाती थीं। हां, तो शिवा जी का सन् १६२७ में जन्म हुआ। उन के सम- कालीन इतिहासकारों का कथन है कि ज्यों २ शिवा जी की आयु बढ़ती गई त्यों २ वे हिन्दू जाति की परतन्त्रता अनुभव कर के विशेष दुखी होते गये। जब वे यवनों द्वारा हिन्दू-देवी देवताओं के मन्दिरों के नष्ट किये जाने तथा अपने पूर्वजों की यादगारों के अपमानित तथा अपवित्र किये जाने के विषय में सोचते थे तो उन का हृदय विदीर्ण हो जाता था। उन की वीर माता जीजाबाई ने बाल्यावस्था में ही उन का हृदय, हिन्दू जाति के गौरव तथा नरपुङ्गव श्री राम, कृष्ण, अर्जुन, भीम, अभिमन्यु तथा सत्यवादी हरिश्चन्द्र की सत्कीर्त्तियों से भर दिया था, फलतः उनके हृदय-गगन में उसी प्रकार के उत्साह तथा आशा के बादल मंडराने लगे। प्रत्येक आस्तिक के मुख से—जिसका कि देवी-देवताओं के प्रति विश्वास था और जिसके हृदय में कृष्ण भगवान् की अटल प्रतिज्ञा सदा गूंजती रहती थी कि वे उन से कभी विमुख न होंगे-यह बात निकलती थी कि हिंदु संसार की रक्षा के लिए कोई उद्धारक अवश्य अवतीर्ण होगा। शिवाजी के कुटुम्ब की इसी परम्परागत धारणा ने उनके हृदय में इस बात का विश्वास भर दिया कि यह मेरा ही कुल है जिसको ऐसे राष्ट्र-उद्धारक