भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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[ १४ ] उनके उत्तर में शिवा जी ने इस अभियोग को अस्वीकार करते हुए लिखा कि वह बीजापुर के शाह के प्रति विद्रोही नहीं है और उसे अपने कर्त्तव्य का स्मरण कराते हुए लिखा था कि उन्होंने केवल ईश्वर के प्रति अपने विश्वास की दृढ़ प्रतिज्ञा की थी न कि किसी शाह के प्रति। धर्म पर किसी राजा का अधिकार नहीं है। क्या आपने अपने संरक्षक दादा जी तथा मित्रमण्डल के साथ सह्याद्रि पर्वत के शिखर पर ईश्वर को साक्षी देकर यह शपथ न ली थी, कि हिन्दुस्तान में एक हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने के लिये हम लोग प्राणपण से अंत तक लड़ेंगे ? इस समय परमात्मा की हम लोगों पर कृपा है और परमात्म अवश्य सफल होंगे। शिवाजी की पवित्र लेखनी से निकले हुए “हिन्दवी स्वराज्य” के शब्दों ने इस धार्मिक आन्दोलन के ध्येय को जितना भली भांति प्रकट किया उतना अन्य कोई वस्तु स्पष्ट नहीं कर सकती थी। इस आंदोलन ने महाराष्ट्र-देशवासियों के जीवन और कार्य को सौ से अधिक वर्षों तक प्रोत्साहित किये रखा। मरहठों का यह आंदोलन प्रारम्भिक काल से ही व्यक्तिगत अथवा प्रान्तीय आंदोलन न था, वरन् यह तो भारत के सारे हिन्दुओं का अपने धर्म तथा स्वत्व की रक्षा करने और भारतवर्ष से विधर्मियों के राज्य को नष्ट करके एक दृढ़ सुविशाल स्वतन्त्र हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने के लिये एक आन्दोलन था। देशभक्ति के इस भाव से केवल शिवाजी ही प्रोत्साहित न हुए थे वरन् उनके सारे मित्रों तथा महाराष्ट्र वासियों के हृदय में भी किसी न- किसी अंश में अवश्य यह प्रोत्साहन पाया जाता था। उनके हृदय को भी वह उतना ही प्रोत्साहित कर रहा था जितना कि शिवाजी के मन को, यही कारण है कि शिवाजी जहां भी पधारते थे उनका स्वागत एक प्रसिद्ध देशोद्धारक के रूप में श्रद्धापूर्वक किया जाता था।