हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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कुछ लोग अभी तक भी मुसलमानों का साथ दे रहे थे और उनके पक्षपाती बने हुए थे, इसके कई कारण थे—(१) कई व्यक्तियों के हृदयों में मुसलमानों की धाक जमी हुई थी, उनका यह विचार था कि इस बादशाही के सामने मरहठों का आन्दोलन कभी सफल नहीं हो सकता (२) कुछ मिथ्याभिमानी तथा बहुत विचारवान् लोग शिवाजी जैसे अनुभवहीन नवयुवक नेता की अध्यक्षता में काम करना अपनी अप्रतिष्ठा समझते थे तथा (३) कुछ ऐसे भी स्वार्थी लोग विद्यमान थे, जिन्होंने व्यक्ति- गत स्वार्थपूर्ति के लिये यवनराज्य का चिरस्थायी रहना ही परमावश्यक समझ रक्खा था। शिवाजी महाराज उस समय केवल महाराष्ट्रवासियों के ही प्रमुख नायक न थे, वरन् वे सारे दक्षिण और उत्तरी भारतवर्ष के हिन्दुओं के मनोरथ पूर्ण करने वाले शूरवीर अगुवा समझे जाते थे। लोगों का यह दृढ़ विश्वास था कि एक दिन ऐसा आयेगा जब कि यही महावीर हिन्दू- जाति तथा भारतवर्ष को स्वतन्त्र करने के यश को प्राप्त करेंगे। उस समय का इतिहास और साहित्य, ऐसी बहुत-सी घटनाओं तथा गद्यांशों से भरा पड़ा है, जिनके पढ़ने से यह पता लगता है कि लोग शिवाजी, महात्मा रामदासजी तथा उनके वंशजों को, उनके उद्देश्यों और कार्यों के कारण, अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति की दृष्टि से देखते थे। सारे प्रान्तों और नगरों के लोगों की यह प्रबल इच्छा थी, और वह इस बात जोर भी देते थे, कि मरहठा सेना शिवाजी के नेतृत्व में उनके हां आये; तथा वे उस शुभ दिनकी प्रतीक्षा में रहते थे कि कब मुसलमानों झण्डे को फाड़ कर उस की जगह महाराष्ट्र की पवित्र गेरुवा विजयध्वजा चढ़ती हुई दिखाई दे। इस कथन को प्रमाणित करने के लिए हम "सवनूर" निवासी हिन्दुओं का शिवाजी के नाम भेजे हुए हृदयविदारक पत्र का दृष्टान्त देते हैं। यह पत्र उन्होंने उस समय शिवाजी को भेजा था जब कि उस प्रांत के