हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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कुछ लोग अभी तक भी मुसलमानों का साथ दे रहे थे और उनके पक्षपाती बने हुए थे, इसके कई कारण थे—(१) कई व्यक्तियों के हृदयों में मुसलमानों की धाक जमी हुई थी, उनका यह विचार था कि इस बादशाही के सामने मरहठों का आन्दोलन कभी सफल नहीं हो सकता (२) कुछ मिथ्याभिमानी तथा बहुत विचारवान् लोग शिवाजी जैसे अनुभवहीन नवयुवक नेता की अध्यक्षता में काम करना अपनी अप्रतिष्ठा समझते थे तथा (३) कुछ ऐसे भी स्वार्थी लोग विद्यमान थे, जिन्होंने व्यक्ति- गत स्वार्थपूर्ति के लिये यवनराज्य का चिरस्थायी रहना ही परमावश्यक समझ रक्खा था। शिवाजी महाराज उस समय केवल महाराष्ट्रवासियों के ही प्रमुख नायक न थे, वरन् वे सारे दक्षिण और उत्तरी भारतवर्ष के हिन्दुओं के मनोरथ पूर्ण करने वाले शूरवीर अगुवा समझे जाते थे। लोगों का यह दृढ़ विश्वास था कि एक दिन ऐसा आयेगा जब कि यही महावीर हिन्दू- जाति तथा भारतवर्ष को स्वतन्त्र करने के यश को प्राप्त करेंगे। उस समय का इतिहास और साहित्य, ऐसी बहुत-सी घटनाओं तथा गद्यांशों से भरा पड़ा है, जिनके पढ़ने से यह पता लगता है कि लोग शिवाजी, महात्मा रामदासजी तथा उनके वंशजों को, उनके उद्देश्यों और कार्यों के कारण, अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति की दृष्टि से देखते थे। सारे प्रान्तों और नगरों के लोगों की यह प्रबल इच्छा थी, और वह इस बात जोर भी देते थे, कि मरहठा सेना शिवाजी के नेतृत्व में उनके हां आये; तथा वे उस शुभ दिनकी प्रतीक्षा में रहते थे कि कब मुसलमानों झण्डे को फाड़ कर उस की जगह महाराष्ट्र की पवित्र गेरुवा विजयध्वजा चढ़ती हुई दिखाई दे। इस कथन को प्रमाणित करने के लिए हम "सवनूर" निवासी हिन्दुओं का शिवाजी के नाम भेजे हुए हृदयविदारक पत्र का दृष्टान्त देते हैं। यह पत्र उन्होंने उस समय शिवाजी को भेजा था जब कि उस प्रांत के
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हिंदु यवनों के शासन को अधिक काल के लिए सहन न कर सके। इस पत्र में उन लोगों ने धर्मान्ध, अन्यायी यवनों के शासन का रोमाञ्चकारी नग्न चित्र खींचते हुए लिखा था -- "हम लोग विधर्मियों के निर्दयी राज्य से अत्यन्त पीड़ित हैं, धर्म नित्य पैरों तले कुचला जा रहा है, और हमारा धर्म मिट्टी में मिलाया जा रहा है। इसलिये हे हिन्दू-धर्म के रक्षक ! दुष्टों का दमन करने वाले ! विदेशी राज्य को धूल में मिलाने वाले शिवाजी महाराज ! आइये, शीघ्र आइये; हम लोग इस समय सेनापति यूसुफ तथा उनकी सेना के अधीन हैं। हमारा धन जन उन्ही के हाथ में है। इसने हमें अपने ही घरों में कैदी बना रखा है। द्वार पर कठिन पहरा बिठा दिया है। हमारा अन्न जल रोक कर यह हमें भूखों मारने का प्रयत्न कर रहा है। इसको मालूम हो गया है कि हम लोग आपसे सहानुभूति रखते हैं और आपके बुलाने के लिये षड्यन्त्र रच रहे हैं। इसलिये हम दीन हिन्दुओं पर दया कर, रात को दिन समझें, और जितना शीघ्र होसके आकर हमें काल के गाल से छुड़ाने की कृपा करें।" महाराष्ट्र की सीमा के बाहर वाले हिन्दुओं के आर्त्तनाद ने शिवाजी के हृदय पर कैसा प्रभाव डाला, यह लिखना व्यर्थ है, क्योंकि जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही हिन्दू-धर्म की रक्षा करना था, वे भला ऐसे अवसर पर कैसे विलम्ब कर सकते थे ! शीघ्र ही मरहटों का प्रसिद्ध सेनापति "हम्भीरराव" अपनी सेना लेकर वहां जा पहुंचा और उसने बीजापुर की यवन सेना को कई युद्धस्थलों पर पूर्ण रूप से पराजित किया और हिन्दुओं को मुसलमान अन्याथियों के चंगुल से छुड़ा कर उस प्रान्त को म्लेच्छ शासन से मुक्त करा दिया। पूना और सूपा की छोटी जागीरों का उचित प्रबन्ध करके, तथा अपने बारह मावलों (जिलों) को पूर्ण रूप से संगठित करने के अनन्तर, शिवाजी ने लगभग १६ वर्ष की अवस्था में अपने कुछ चुने- हुए प्रमुख वीरों की सहायता से उस प्रान्त के तोराना और दूसरे प्रसिद्ध
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२ किलों पर अचानक चढ़ाई कर दी और बड़ी वीरता और निपुणता के साथ लड़ कर उन्हें हस्तगत कर लिया। बीजापुर की सेना पर—जो कि सेनापति अफ़ज़लखां की अध्यक्षता में लड़ रही थी—भली प्रकार दोहरी विजय पा कर मुग़लों का खुल्लमखुल्ला सामना करना आरम्भ कर दिया। शिवाजी अपनी चतुराई से कभी पीछे हटने और कभी अचानक शत्रुओं पर चढ़ आते थे। इस प्रकार अनेक मुग़ल सरदारों और सेनापतियों का दमन कर उन्हें लड़ाई में सब प्रकार से नीचा दिखा कर पीछे हटाते रहे। इस प्रकार शत्रुओं के दिल में इतना भय समा गया कि शाहंशाह औरङ्गज़ेब ने भी भयभीत होकर थोड़े काल के लिये युद्ध बन्द करने में ही अपनी बुद्धिमानी समझी और अपने अजयशत्रु शिवाजी को प्रलोभनादि द्वारा जाल में फंसाने का निश्चय किया। परन्तु शिवाजी औरङ्गज़ेब के कपटजाल में कब आने वाले थे ? उन्होंने शत्रु के कपट जाल को तोड़ दिया और उसकी आशा को सब प्रकार निराशा में पलट दिया अर्थात् आगरे के क़ैदख़ाने से बिना किसी हानि उठाये निकल भागे, और सकुशल रायगढ़ पहुंच कर मुग़लों से पुनः घोर लड़ाई छेड़ दी। शिवाजी ने सिंहनाद के दुर्ग को पुनः हस्तगत कर लिया। कई अन्य सेनापतियों ने भी मुसलमानों के छक्के छुड़ा कर यश प्राप्त किया। अन्त में शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करा कर हिन्दुओं का छत्रपति—अर्थात् हिन्दूधर्म और सभ्यता का अभिनेता—बनने में ही अपना हित समझा। विजयनगर के पतन के पश्चात् किसी भी हिन्दू-राजा को यह साहस न हुआ था कि वह स्वतन्त्र-छत्रपति के मुकुट से अपने सिर को पुनः सुशोभित करे। अब शिवाजी के नवीन राज्याभिषेक ने मुसलमानी धाक को समूल नष्ट कर दिया। इसके पश्चात् होने वाली किसी भी लड़ाई में मुसलमान हिन्दुओं का सामना न कर सके। उपरोक्त घटनायें स्वयम् उनके कार्यकर्त्ताओं के लिये भी आश्चर्य जनक थीं। उस समय के सब से प्रतिष्ठित और हिन्दू-धर्म की स्वतन्त्रता
[ १८ ] के भविष्यवक्ता, पूज्यपाद स्वामी रामदास जी बड़ी प्रसन्नता तथा गौरव के साथ एक स्वप्न के सम्बन्ध में कहते हैं, "कि जो कुछ मैंने स्वप्नावस्था में देखा था उसकी पूर्ति पहले ही हो गई थी। जिस स्वप्न को मैंने अन्ध- कारपूर्ण रात्रि में देखा था वह •अक्षरशः सत्य निकला, अर्थात् भारत की निद्रा भङ्ग हुई, लोग अपने आपको पहचानने लगे। जो भारत से घृणा करते थे तथा ईश्वर के प्रति अपराध करते थे उनको दृढ़ हाथों से कुचल दिया गया। सचमुच भारत पवित्र और भाग्यशाली देश है। क्योंकि भारत के ध्येय को परमात्मा ने अपना ध्येय बना लिया है, इस लिये औरङ्गज़ेब का पतन हो जायगा। जो लोग सिंहासन पर विराजते थे वे पदच्युत हो गये और जो किसी समय राज्यसिंहासन से उतारे गये थे पुनः सुशोभित हो गये। मनुष्यों का श्रेय, शब्दों की अपेक्षा उनके कर्त्तव्यों से भलीभांति विदित होता है। सचमुच भारतवर्ष एक पवित्र पुण्यक्षेत्र है, इसके धर्म की रक्षा अब राजधर्म से होगी। अब राक्षसी- शक्ति द्वारा देश का पावन जल अपवित्र नहीं होता रहेगा और एक बार पुनः इस पुण्य भूमि पर हमें यज्ञ पूजनादि कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त होगा।" यह धर्मयुद्ध परमात्मा के नाम पर आरम्भ किया गया था। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए जब महाराज शिवाजी एक स्वतन्त्रराज्य को स्थापित करने में फलीभूत हुए तो उन्होंने इस ईश्वरदत्त राज्य को अपने आध्यात्मिक तथा राजनैतिक पथप्रदर्शक गुरु स्वामी रामदासजी के चरणों श्रद्धापूर्वक भेंट के रूप में अर्पण किया। किन्तु स्वामी जी ने भी उसी य को स्मरण कर उक्त राज्य अपने सुयोग्य शिष्य शिवाजी को मनुष्य- ति के उपकार तथा ईश्वरीय धर्म की रक्षार्थेतु प्रसादरूप में निछावर किया और कहा— राज्य शिवाजी चें नव्हे—राज्य धर्माचें आहे। 🌼 महाराज शिवाजी से लेकर बाजीराव तक कर्मवीर मरहठों के 🌼 राज्य शिवा जी का नहीं है, किन्तु धर्म का है।
[ १६ ] प्रति सारे भारतवर्ष के हिन्दुओं की जैसी श्रद्धा थी और उनके किये पर जितना वे अपना गौरव समझते थे वह "छत्र-प्रकाश" नामक ... पूर्ण ग्रन्थ के पढ़ने से स्पष्ट विदित हो जाता है, यद्यपि इसका बुन्देलखण्ड-बासी हिन्दू था। एवं राजकवि "भूषण" ने भी महार... शिवाजी की वीरता का वर्णन जिस ओजस्विनी कविता में किया है ... से स्पष्ट प्रकट होता है कि उपरोक्त कविगण महाराष्ट्र के रहने वाले होकर भी उनके चरणों में कैसी भक्ति रखते थे। इतना ही नहीं, कवि तो महाराज शिवाजी के कर्त्तव्यों को भावपूर्ण कविता में घूम-घूम कर हिन्दू जाति को जगाते फिरते थे और उनके हृदयों में ... जी के प्रति यह भाव उत्पन्न करते थे कि महाराज शिवाजी हिन्दूधर्म रक्षक हैं। इसी कारण से उनके पवित्र कर्त्तव्यों को सारे भारतवासी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। स्थानाभाव से केवल एक आध ... उदाहरणार्थ लेखनीबद्ध की जाती है। कासीहू की कला जाती, मथुरा मसीत होती, शिवाजी न होतो तो, सुनति होत सबकी॥ राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यो, स्मृति और पुराण राखे वेद-विधि सुनी मैं॥ राखी रजपूती राजधानी राखी राजन की, धरा में धरम राख्यो, राख्यो गुन गुनी में॥ "भूषण" सुकवि जीति हद मरहट्टन की, देश-देश कीरति बखानी तब सुनी मैं॥ साहि के सपूत सिवराज समशेर तेरी, दिल्ली दल दारिके दिवाल राखी दुनी मैं॥ इस प्रकार हिंदू धर्म और हिंदु-पद-पादशाही के नाम पर ... पैदा करने वाला आह्वान और युद्ध-संगीत जो महाराष्ट्रीय हुंदु... निकला वह सह्याद्रि पर्वत की चोटी से निकल कर सारे भारतवर्ष
[ २० ] न्दुओ के हृदय में भर गया, जिससे उनका हृदय उत्साह से उछलने ा। परिणामतः वे अनुभव करने लगे कि जिस अभिप्राय से मरहठे इकर प्राण निछावर कर रहे हैं उसका अस्तित्व केवल भारत और गतवासियों को विदेशियों के दासत्व से मुक्त कराने के लिए ही है। ——— ३. शिवाजी के उत्तराधिकारी सन् १६८० ईस्वी में महाराज शिवाजी का और १६८१ ई० में हात्मा रामदासजी का देहान्त होगया। यद्यपि इन लोगों ने अपने वनकाल में "हिन्दू-पद-पादशाही" के लिये घोर परिश्रम करके बहुत क्र प्राप्त कर लिया था तथापि अभी तक उससे भी अधिक बहुत कुछ प्राप्त ने के लिये शेष पड़ा था। ऐसे अवसर पर उन लोगों की मृत्यु इस न्दोलन के लिये बड़ी ही हानिकारक थी। जो हो, "ईश्वरेच्छा रीयसी !!" यद्यपि उन महापुरुषों के सांसारिक जीवन का अन्त हो गया ापि इन्होंने जिस आन्दोलन को सारे भारत में प्रचलित किया था का अन्त किसी भी अंश में न होने पाया, क्योंकि इस आन्दोलन आधार किसी व्यक्तिविशेष के जीवन पर अवलंबित न था, वरन् की जड़ें राष्ट्रजीवन के गर्भ में गड़ चुकी थीं। यह मरहठों के तहास की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जिसे हम उन पाठकों के चित्त अङ्कित करने का प्रयत्न कर रहे हैं, जो महाराष्ट्र प्रान्त निवासी नहीं । महाराज शिवाजी तथा उनके पूज्य गुरु स्वामी रामदास जी के वनचरित को प्रायः सारे भारतवासी कुछ-न-कुछ अवश्य ही जानते · पर महाराष्ट्र के इतिहास के पिछले भाग से पूर्णतया अनभिज्ञ और यदि किसी अंश में कुछ जानते भी हैं तो उसे निराधार तथा
अनिश्चित समझते हैं। साधारणतः भारतवर्ष या हिन्दू इतिहास पढ़ने वाले यही अनुभव करते हैं कि शिवाजी तथा रामदास ही पहले और आख़िरी मरहठा देश-भक्त हुए हैं, जिनका मनशा भारत में "हिन्दू-पद- पादशाही" स्थापित करने का था, और जिन्होंने कि हिन्दुत्व के लिये बडी शूरता, वीरता तथा अपने अपूर्व साहस का परिचय दिया था। इतना ही नहीं, अपितु महाराष्ट्र के सम्बन्ध में लोगों की यह धारणा दिखाई पड़ती है कि जहां महाराज शिवाजी के प्रादुर्भाव के साथ महाराष्ट्र का इतिहास प्रारम्भ हुआ वहा इनके निधन के साथ ही उस आन्दोलन की इतिश्री भी हो गई । और उनके पश्चात् जो कुछ हुआ एक अशान्ति का समय था, अथवा स्वार्थांध और आचार भ्रष्ट लोग लुटेरों का दल बनाकर इधर-उधर लोगों पर आक्रमण करते हुए देश का सत्यानाश करते रहे। ये दोनों ही कल्पनाएं नितात ही असत्य हैं। तथ्य तो यह है कि शिवाजी तथा रामदास की बड़ाई तो इसी बात में निहित है कि उन का वह आन्दोलन उन की मृत्यु के पश्चात् भी न केवल बहुत काल तक जीवित ही रहा, वरन् उनके पश्चात् भी उस में फाल्श सैकड़ों ही महाराष्ट्र के सुयोग्य देशभक्त, व्यवस्थापक और देश पर प्राणों की आहुति चढ़ाने वाले शूरवीर सरदार एक न टूटने वाले क्रम में पैदा होते रहे। वे उसी उद्देश्य के लिए अपने पूर्ण बल से लड़ते हुए हिन्दू-पद-पादशाही के लक्ष्य की ओर बढ़ते गये और उन्होंने ऐसे ऐसे परिणाम प्राप्त किये जिन्हें देखकर शिवाजी महाराज भी चकित होते। जिस समय शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ था उस समय उनके अधिकार में मुशकिल से एक प्रान्त था, इस पर भी उस समय यह एक बड़े गौरव की बात समझी गई थी। यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो वास्तविक महाराष्ट्र का तब स्थित हुआ जब कि महाराज शिवाजी के उत्तराधिकारी राघुवा दादाजी के आधिपत्य में, पञ्जाब की राजधानी लाहौर में से प्रविष्ट हुए, और फिर जब उनके बहादुर घोडे उछलते-कूदते
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टापों से धूल उड़ाते, विजय प्राप्त करते, सिन्ध के किनारे तक पहुंचे अर्थात् जब एक महादेश को उन्होंने अपनी छत्रछाया में कर लिया। शिवाजी के देहान्त के समय मुग़ल बादशाह औरङ्गज़ेब जीवित था। उसके हृदय में हिन्दुओं के प्रति घृणा के भाव भी वर्त्तमान थे। उन घृणा के भावों का सत्यानास करने के लिये शिवाजी ने आजन्म सुख की नींद न ली थी और उन की यह उत्कट इच्छा उनके साथ स्वर्गगामिनी हुई। किन्तु शिवाजी के उत्तराधिकारिणी महाराष्ट्र जाति ने अपने पूर्वजों पर किये गये विधर्मियों के अत्याचारों का बदला ब्याज सहित उन से लिया और औरङ्गज़ेब को, उसके हिन्दुओं के प्रति घृणा के भावों सहित अहमदनगर की क़ब्र में दफ़न किया तथा हिन्दू-धर्म को काल के गाल से छुड़ाया। ज़रा ध्यान दीजिये कि यदि ऐसा न हुआ होता तो जो स्वराज्य का बीज रायगढ़ में शिवाजी के हाथों बोया गया था, वह कभी भी एक विशाल वृक्ष रूपी राज्य के स्वरूप में दिखाई न देता, वरन् निरर्थक काल की धूल में नष्टभ्रष्ट हो जाता और कभी फूल और फल न सकता। शिवाजी महाराज ने तो केवल रायगढ़ पर राज्य किया, पर उनके उत्तराधिकारियों के लिये भारत की प्राचीन राजधानी दिल्ली पर राज्य करने के दिन सन्निकट थे। यह कहना अत्युक्ति-पूर्ण न होगा कि यदि धनाजी, सन्ताजी, बालाजी, बाजीराव, भाऊ, मलहरराव, दत्ताजी, माधवराव, परशुरामपन्त और बापूजी जैसे महान व्यक्ति क्रमशः समयानुकूल अपना सिर न उठाते और रणक्षेत्र में अपना कौशल न दिखाते तथा देश और धर्म के लिये बलिदान न देते, तो महाराज शिवाजी का मनोरथ अधूरा ही पड़ा रहता और जो उन्होंने अपने जीवन में सफलता प्राप्त की थी वह जनसमाज में वैसी ही साधारण हो जाती जैसी कि पटवर्द्धन या बुन्देलाराज्य स्थापित करने वाले नेताओं की हुई, तथा हमें हिन्दू-इतिहास में शिवाजी को ऐसे अनुपम प्रतिष्ठा और गौरवपूर्ण पदपर आरूढ़ देखने का अवसर न मिलता।
[ २३ ] शिवाजी के एक अपूर्व शक्तिशाली पुरुष होने का मुख्य कारण यह था कि उनके सजातीय लोग आजन्म उनका साथ देते रहे, उनके साथ सर्वदा सहानुभूति रखते आये और जिस कार्य को शिवाजी लेकर कार्यक्षेत्र में उतरे, उसको सफल बनाने के लिये तनमन से प्रयत्न करते रहे तथा उनकी प्रबल आशा और इच्छा को समयानुकूल प्राणपण से पूर्ण करते रहे। इस प्रकार हमें आगे चलकर यह अवश्य मानना पड़ेगा कि महाराष्ट्र का इतिहास शिवाजी के मृत्युकाल से प्रारम्भ होता है। शिवाजी ने अपने जीवन काल में एक छोटे से प्रदेश की नींव डाली थी, पर उसका विशाल राज्य में परिणत करने का काम उनके उत्तराधिका- रियों का था, जिसकी पूर्ति, महाराज के परलोकवासी होने के हुई, या यों कहना उपयुक्त होगा कि महाराष्ट्र के वीर रस प्रधान इतिहास का आरम्भ उस समय हुआ जब कि शिवा जी हिन्दू जाति में * शक्तियां उत्पन्न करने के पश्चात् परलोकवास कर गये। ये शक्तियां उनके पश्चात् बड़े वेग से काम करती रही। ———— ४. "धर्मासाठीं मरावे" * —रामदास महाराष्ट्र धर्म, और इस धर्म के द्वारा महाराष्ट्र में हिन्दुओं के पुनरुद्धार के आन्दोलन में भरी हुई शक्ति के विषय में औरंगजेब ने जो अनुमान लगाया था वह अक्षरशः असत्य निकला। उसका विचार था कि जैसे अनेकों दूसरे आन्दोलन अपने नेताओं की मृत्यु के पश्चात् समाप्त होजाते हैं उसी प्रकार इस आन्दोलन का भी शिवाजी की मृत्यु के बाद अन्त हो जायगा, विशेषकर ऐसी अवस्था में जब कि उनका उत्तराधिकारी उनका अयोग्य-पर वीर-पुत्र संभाजी बना। इसलिए औरंगजेब ने ऐसे अवसर ——————————————————————————————
- धर्म के लिये मरो।
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को हाथ से न जाने देने का निश्चय किया। काबुल से लेकर बंगाल तक फैले हुए साम्राज्य के जन-धन के विस्तृत साधन उसके अधिकार में थे। अतः वह तीन लाख की सेना लेकर दक्षिण पर चढ़ आया। शिवा जी को भी कभी अपने जीवन काल में इतनी सेना का सामना न करना पड़ा था। औरंगज़ेब ने अन्दाज़ा लगाने में भूल नहीं की थी, क्योंकि सारे मुग़ल साम्राज्य की यह सुसंगठित शक्ति मरहठों की ऐसी असंगठित रियासत से दसगुना बड़े राज्य का भी अनायास नाश कर सकती थी। मुग़लों की ऐसी सुसंगठित शक्ति का मुकाबला करने के लिए मरहठों को ऐसा नेता मिला जो कि एक महान् राष्ट्र का पथ-प्रदर्शन करने के नितान्त अयोग्य था। संभाजी अयोग्य ही नहीं वरन दुष्ट प्रकृति भी था, और इन उपरोक्त अवगुणों के होते हुए भी, संभाजी ने अपने मरणकाल तक ऐसी निर्भीकता दिखाई, जो उस के सारे अवगुणों को मिटा कर उसे शिवाजी का एक सुपुत्र तथा हिन्दू-आन्दोलन का एक महान् व्यक्ति प्रमाणित करती है। जिस समय वह औरंगज़ेब के दरबार में एक विवश कैदी के रूप में खड़ा था और विधर्मी उसे मुसलमान हो जाने के लिये विवश कर रहे थे, कदाचित् उस जैसी बुरी प्रकृति वाला पुरुष मृत्यु के भय से तथा दुष्टों के लोभ या यातना से अपने धर्म को तिलाञ्जलि देने में ज़रा भी नहीं हिचकता, पर वाह रे संभाजी! यह तुम्हारा ही दृढ़ हृदय था, जो ऐसे संकटमय समय आ पड़ने पर भी तुमने शत्रुओं को भरे दरबार में निर्भयता पूर्वक मुंह तोड़ जवाब दिया और इस घृण्य कर्म को उपेक्षा करके मृत्यु का आनन्दपूर्वक हंसते २ स्वागत किया, और अपने पूर्वजों की धर्मभक्ति का पूर्ण समर्थन किया तथा अन्यायी मुसलमानों के ज्ञान तथा उनकी धर्म पुस्तकों की घोर निन्दा की जिससे औरंगज़ेब को अनुभव हो गया कि वह इस मरहठे शेर को क्षुद्र कुत्ते की तरह वशीभूत नहीं कर सकता। अंततः उसने अपने सारे प्रयत्नों को विफल होता जान कर आज्ञा दी कि इस काफ़िर को मार डाला जाये। औरंगज़ेब
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की यह अन्तिम धमकी भी उस धर्मवीर को अपने धर्म से विचलित न कर सकी। अन्यायियों ने लोहे के गरम चिमटे से संभाजी की आंखें निकाल लीं, उसकी जिह्वा के टुकड़े २ कर दिये। परन्तु फिर भी वे उस शाही शहीद को भयभीत न कर सके। अन्त में उसके पञ्चभौतिक शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिये गये। इस प्रकार वह मुसलिम धर्मान्धता का शिकार बन गये और अपने बलिदान से हिन्दुओं के लिए अमर कीर्ति प्राप्त कर गए। अपने इस एक आत्म-बलिदान के महाकार्य से संभाजी ने महाराष्ट्र धर्म—हिन्दु जाति के पुनरुद्धार के धर्म—की वृत्ति का जो प्रतिनिधित्व किया वह किसी अन्य कार्य द्वारा नहीं हो सकता था। यदि वह लुटेरों का नेता होता तो उसका कार्य निश्चित ही इसके विपरीत होता। वाह रे संभाजी ! तुम्हारी इस धर्म-परायणता पर सौ-सौ बार धन्यवाद है। हिन्दू- जाति तुम्हारी सदा के लिये ऋणी रहेगी। ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शान्ति दे और भारत के धर्माकाश में तुम्हारी कीर्ति अनन्त काल तक सूर्य की तरह प्रकाशित रहे और हिन्दु धर्म के लिये महान् गौरवप्रद और पथप्रदर्शक सिद्ध हो। संभाजी के कारण, शिवाजी के द्वारा उपार्जित राज्य छिन गया, राजकोष खाली हो गया, किले शत्रु के हाथों लुट गये और नष्ट-भ्रष्ट किए गए और यहां तक कि उनकी राजधानी भी मुसलमानों के हाथों में चली गयी। वह इस होनी को रोक न सका। इस प्रकार वह अपने पिता की आजन्म की कमाई की रक्षा न कर सका। परन्तु उस ने अपने महा बलिदान के द्वारा अपने पिता के धार्मिक तथा अध्यात्मिक लाभों की दीप्ति और शक्ति की रक्षा ही नहीं की अपितु वृद्धि भी की। इस प्रकार हिन्दू धर्म की स्वतन्त्रता की लड़ाई का वृक्ष उसके रुधिर से सींचा जाकर विशेष सशक्त और हराभरा हो गया।
[ २६ ] ५. सम्भाजी की मृत्यु का बदला "मरीनि अवघ्यांसि मारावें । मारितां मारितां घ्यावें । राज्य आपुलें" —रामदास राजकुमार संभाजी के धर्म पर बलिदान हो जाने का समाचार ज्यों ही महाराष्ट्र वासियों के कानों में पहुंचा त्यों ही सब के भाव उनके प्रति शीघ्र ही बदल गये अर्थात् उनके आजन्म के किये बुरे कर्मों तथा अपराधों को सभी भूल गये । अपने राजकुमार के प्रति उन में विशेष श्रद्धा उत्पन्न हो गई । उनकी धमनियों में रक्त खौलने लगा और शत्रुओं से राजकुमार की हत्या का बदला लेने के लिये सभी कटिवद्ध हो गये । धन और साधनों के अभाव में भी उन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्त करने का संकल्प कर लिया । सबने एकत्रित होकर शिवा जी के द्वितीय पुत्र राजाराम को अपना अगुआ एवं राजा मान कर हिन्दू धर्म और हिन्दू राज्य की रक्षा के लिये मर मिटने की शपथ ली । समर्थ गुरु रामदास जी की शिक्षायें— 'धर्मासाठीं मरावें, मरोनि अवघ्यांसि मारावें ॥ मारितां मारितां घ्यावें । राज्य आपुलें ॥१॥ मराठा तितुका मेलवावा । आपुला राष्ट्रधर्म वाढवावा ॥ येविशीं न करितां तकवा । पूर्वज हासती ॥ २ ॥ 🌸 मरहठे उनकी मृत्यु के पश्चात् भी न भूले, वरन् जाति के लिये वे जीता-जागता धर्म बन गयीं । राजाराम, नीलोमुरेश्वर, प्रह्लाद नोराजी, 🌸 धर्म के लिये मरो, मरते मरते भी शत्रुओं का संहार करो, राज्य प्राप्ति के लिये मर भी जाओ, मरहठों को संगठित करो, राष्ट्र धर्म को बढ़ाओ । अपने इस कर्तव्य से च्युत होने पर पूर्वजों के परिहास पात्र बनोगे—”
[Header] २७ ] रामचन्द्र पन्त, शङ्करजी मल्हार, परशुराम त्र्यम्बक, सन्ता जी घोरपाड़े, धानाजी यादव, खण्डेराव दभाड़े, निम्बालकर नेमाजीपरसोज़ी, ब्राह्मण, आदि मरहठे, नेतागण तथा राजकुमार और किसान--अथवा यों कहिये कि सारी जाति ही मुसलमान शत्रुओं के विरोध में सशस्त्र खड़ी हो गई। उस समय तक पुनः सारा दक्षिण औरङ्गज़ेब के अधीन हो चुका था। सारा महाराष्ट्र, इसके प्रसिद्ध किले, यहां तक कि स्वयं शिवाजी की पवित्र राजधानी भी मुसलमान सेनापतियों के सैनिक शासन के हाथों दुःखित हो रही थी। यही जान पड़ता था कि शिवाजी तथा उनके वंशजों ने व्यर्थ ही इसके लिये लड़कर अपने प्राण गंवाये थे। लेकिन किले और राजधानी पास नहीं तो क्या हुआ! जो जात अपनी स्वाधीनता प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखती हो, वह अपना किला अपने हृदय में बना सकती है। उसका उच्च आदर्श ही जातीय ध्वजा का काम देता है और जहां कहीं जाकर फहराता है, वही उसकी राजधानी बन जाती है। इस उच्च विचार ने सारे महाराष्ट्र-वासियों के हृदय में एक नवीन ज्योति पैदा कर दी। उन्होंने युद्ध को एक क्षण के लिये भी बंद न करने का दृढ़ निश्चय कर लिया और वे कहने लगे- "यदि हम लोगों के हाथ से महाराष्ट्र खो गया है तो क्या हुआ, चलो मद्रास में चलकर लड़ाई छेड़ें। यदि रायगढ़ हाथ से निकल गया है तो हिन्दू-पद-पादशाही का झण्डा जिनजी में चलकर गाड़ दें और लड़ाई एक दिन के लिये भी बन्द न करें।" इस प्रकार की प्रौढ़ प्रतिज्ञा करके, मरहठे मुगलसम्राट्-औरङ्गज़ेब की विशाल सेना से लगभग २० वर्ष तक लड़ते रहे। अन्त में उसे निराश और हार कर महाराष्ट्र तथा दक्खिन से भाग जाने पर विवश होना, इसी शोक में दुखी होकर वह सन् १७०७ ईस्वी के साल अहमदनगर में मर गया। मरहठों की अद्भुत युद्ध कला जिसे "गनिमी कावा' कहते हैं, इस लम्बी लड़ाई में विशेष लाभदायक सिद्ध हुई। बिजली की तरह चंचलता, वीरता और साहस के साथ मरहठा सेना, अद्वितीय सेनापतियों
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की अध्यक्षता में, कभी एकत्रित होती, कभी छिटपुट रहती; कभी आक्रमण करनी, कभी पीछे हट जाती; कभी आगे बढ़ती, कभी पीछे पांव धरती; कभी लड़ती, कभी भागती; कभी लड़ाई में पांव जमाती। इस युद्ध कौशल ने मुगलों को खूब सताया और उन्हें हर जगह से दुम दबा कर भाग जाना पड़ा। इस प्रकार विचित्र लड़ाई लड़कर मरहठों ने मुगलों के साहस को चूर्ण कर धूल में मिला दिया। प्रत्येक नामी मुसलिम सेनापति और नायक को या तो परास्त किया गया या अपमानित किया गया। उन्हें या तो कैदी बना लिया अथवा मार डाला गया। जुलफिकार खां, अली मरदान खां, हिम्मत खां और कासिम खां आदि मुग़ल सेनापतियों को मरहठे सरदारों धानजी, मन्ताजी आदि ने जिनजी, कावेरीपाक, दुगारी और अन्य दूसरे युद्धस्थलों में ऐसा बुरी तरह हराया कि उनकी सेना छिन्न- भिन्न हो गई, जिससे मुग़ल बादशाह औरङ्गज़ेब को महाराष्ट्र विजय करने की इच्छा फिर स्वप्न में भी न हुई। इस प्रकार मरहठे शत्रुओं का दमन करते हुए आगे बढ़े और उन्होंने सीधा मुग़लों की शाही छावनियों पर धावा बोल दिया, दूसरे शब्दों में उन्होंने सिंह को उसकी मांद ही में आकर ललकारा। बादशाह ज़िन्दा ही पकड़ा जाता, यदि भाग्यवश अपने बादशाही सुनहरी खेमे से भाग न गया होता। मरहठों ने खेमें पर अपना अधिकार कर लिया और उसे उखड़वा कर अपने साथ ले आये। इस समय सभी मरहठे सेनापतियों के हृदय में देशभक्ति का अपूर्व उत्साह भरा हुआ था, जो निम्नलिखित बातों से स्पष्ट हो जायगा-- प्रसिद्ध सेनापति खाएडोचल्लाल ने उन मरहठा सरदारों को, जो कि अभी जिनजी को घेरने में मुग़लों का साथ दे रहे थे, अपनी ओर मिलाने का कठोर परिश्रम और प्रयत्न किया। परोक्ष रीति से उन्होंने नागोजी राजे के साथ, उसे अपनी ओर करने के लिये, पत्र व्यवहार
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आरम्भ कर दिया। पत्र में उसे यह भली भांति समझाया गया कि आप राजाराम से आकर मिल जायें तो हम लोग अनायास मुग़ल का जिनजी में सत्यानास कर सकते हैं। दूसरे यह आपका कर्तव्य भी है कि आप मरहठों की सहायता करें जो कि अपने के धर्म और देश की रक्षा करने का प्रयत्न कर रहे हैं। वीर नागोजी राजा ने मरहठों की उक्त प्रार्थना को स्वीकार लिया और एक हिन्दू के नाते, अपना उचित कर्तव्य समझ, पांच सहस्र अनुयायियों के साथ मुसलमानी फ़ौज से निकलकर मरहठों से आ मिला। इसके पश्चात् खण्डोपलाल ने शिर्का को भी, जो कि अभी तक मुग़लों की ओर ही था, मरहठों की ओर मिला लेने का दृढ़ निश्चय किया। परन्तु जब शिर्का ने पत्र में पढ़ा कि राजाराम बड़ी आपत्ति में फंसा हुआ है, तो संभाजी द्वारा अपनी जाति पर किये गये अत्याचारों का स्मरण करके वह अति क्रोधित हो गया और पत्रोत्तर में उसने लिखा कि एक राजाराम ही क्या, यदि सारा भोंसला खानदान भी इस पृथ्वी से मिट जाये तो भी मुझे इसकी तनिक चिन्ता न होगी। क्या वह दिन भूल गये, जब शिर्का लोग संभाजी का निशाना बन रहे थे और जहां कहीं पाये जाते, मार डाले जाते थे? मुझे उन दिनों का स्मरण करके अत्यन्त दुःख होता है। मैं तो भोंसलों के उन बुरे दिनों की प्रतीक्षा कर रहा हूं, जिन्हें देख कर मुझे शान्ति प्राप्त होगी। इस प्रकार का पत्रोत्तर पाकर खण्डोबालाल तनिक भी हतोत्सा- हित न हुआ और अपने विचार द्वारा पुनः प्रार्थना पत्र भेजकर उसने समझाया कि 'ऐ मेरे प्रिय मित्र! सुनिये, आपका लिखना अक्षरशः सत्य है, पर यह बात भी तो सत्य है कि संभाजी ने केवल आप ही की जाति पर अत्याचार नहीं किया था वरन् हमारे परिवार के तीन व्यक्तियों को भी हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था। उसकी चोट मेरे हृदय को उतना ही कष्ट पहुंचा रही है, जितना आपके हृदय को। पर इस समय की समस्या
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किसी परिवार-विशेष से सम्बन्ध नहीं रखती और न ही हम लोग अपने स्वार्थ के लिये लड़ रहे हैं; न हम लोगों का उद्देश्य भोंसला या किसी और ही कुल को ऊंचा करने का है; वरन् हमतो एक हिन्दू प्रजातन्त्र- राज्य के हेतु प्राण दे रहे हैं- "हिन्दूच्या साम्राज्यासाठीं आम्ही झटत आहों !" ॐ शिर्का का हृदय खान्डोवलाल के पत्रोत्तर से द्रवित हो गया और उसकी जातीय भावनायें उद्बुद्ध हो गई । उसके सामने जाति का गौरव नाचने लगा और वह इस जातीय अपील से प्रभावित हुए बिना न रह सका । उसने व्यक्तिगत अपराधों और पारिवारिक झगड़े को भूल कर क्षमा प्रदान की । राजाराम को घिरी हुई मुगल सेना से छुड़ाने का वचन दिया और अपने वचनानुसार अनेक प्रकार की सहायता देकर राजाराम को मुगल सेना से मुक्त कराकर तथा विजेता के रूप में महाराष्ट्र पहुंचा दिया । इस प्रकार केवल शिवाजी के पुत्र का ही नहीं, वरन् उनके पश्चात् उनके वंशजों का भी हृदय देशभक्ति के उच्च भावों से भरा हुआ था । हिन्दू जाति की राजनैतिक स्वतन्त्रता तथा धर्मरक्षा का पवित्र ध्येय सर्वदा उनके हृदय में विराजता था, इसी कारण वे विदेशी और असभ्य शत्रुओं के भयंकर आक्रमण से सदा सचेत रहकर अपने प्राण हथेली पर रखकर, हिन्दू धर्म की रक्षा करते रहे । अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि क्या लुटेरे और बटमार भी ऐसे पराक्रमी शत्रुओं पर युद्ध में विजय प्राप्त कर सकते थे ? कदापि नहीं ! इस प्रकार सफलता प्राप्त करना उन सच्चे धर्मवीर मरहठों का ही काम था । यह धार्मिक वा जातीय शक्ति का ही प्रताप था जिसने उस समय के देशभक्तों को बहुत शक्तिशाली बना दिया और उन्हें देश को ऐसे खतरे से सुरक्षित रखने के योग्य बना दिया जिस का मुक़ाबला देश की कोई दूसरी शक्ति न कर सकती थी । ॐ हिन्दुओं के साम्राज्य की स्थापना के लिए हम प्रयत्न कर रहे हैं।
१. छत्रपति शिवाजी व सम्भाजी महाराज का बलिदान
[ ३१ ] ६. महाराष्ट्र-मण्डल "आहे तितुकें जतन करावें । पुढें आणिक मेळवावें ॥ महाराष्ट्रराज्यचि करावें । जिकडे तिकडे !!" ॐ --रामदास जिस समय औरङ्गजेब का जीवन, उसकी सारी आशा और इच्छाओं के नष्ट हो जाने के कारण, भार-सा हो रहा था और वह दुःख सागर में गोते खा रहा था, उस समय मरहठों ने अवसर पाकर खान देश, गोंडवान, बरार और यहां तक कि गुजरात आदि दूरस्थ प्रदेशों में युद्ध छेड़ दिया। उन्होंने शाहूजी को मुक्त करा लिया तथा दक्खिन के छः सूबों तथा मैसूर, ट्रावनकोर आदि रियासतों से भी, उन्हें लड़ाई में हराकर 'चौथ' और "सरदेशमुखी" वसूल करने लगे। अन्त में मुग़ल सम्राट् को झक मार कर महाराष्ट्र में मरहठों के स्वतन्त्र राज्य का स्वत्व मानना पड़ा। इससे मरहठों की शक्ति पहिले से अधिक बढ़ गई। इस प्रकार मरहठों को अपने घरों का उचित प्रबन्ध करने अपनी बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करने तथा व्यक्तिगत दलबन्दियों के भावों को मिटा कर सर्वसाधारण की इच्छानुसार, अपनी सारी स्वाभाविक और अनिवार्य कमज़ोरियों के होते हुए भी, एक संगठन सूत्र में बांधने का सुअवसर मिल गया, जिसका फल ऐसा उत्तम निकला कि महा- राष्ट्र-मण्डल या कॉन्फिडरेसी-सच्चे अर्थों में "हिन्दू-पद-पादशाही" ब- गई। यह केवल नाममात्र को ही नहीं वरन् वास्तविक रूप में सारे भारतवर्ष पर राज्य करने लगी। जिन व्यक्तिगत त्रुटियों और दुर्बलताओं की ओर मैंने ऊपर संकेत किया है ये वास्तविक ही थीं, क्योंकि ऐसी त्रुटियां सब हिन्दुओं के भीतर अब भी वर्त्तमान हैं। हम आगे चलकर पाठक- ॐ जो कुछ तुम्हारे पास है उसे बचाओ और उसकी वृद्धि के लिए प्रयत्न करो। सब ओर महाराष्ट्र साम्राज्य का प्रसार करो।
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को एक एक करके इनको बताने की चेष्टा करेंगे। सब भ्रमों को दूर करने के लिए यह कह देना ही पर्याप्त होगा कि जितना उनके विषय में हमें ज्ञान है उतना और किसी को न होगा। जब हम उन महान् राष्ट्रीय तथा धार्मिक सिद्धान्तों पर दृष्टि डालते हैं तथा उन का प्रकटी- करण करते हैं जिन्हों ने मरहठा जाति को हिन्दू स्वतन्त्रता के युद्ध को जीतने के लिए प्रयत्नशील बनाया उस समय हम उस तथ्य को भुलाना या कम करके दिखाना नहीं चाहते कि कभी कभी विशेष अवसरों पर व्यक्तिगत द्वेष की आग तथा स्वार्थ और लालच भी उनको अपने जातीय कर्तव्य तथा प्रवृत्ति से विचलित कर देता था। यदि उनमें ये अवगुण न होते तो वे मनुष्यों के स्थान पर देवताओं की जाति बन जाती। यदि हम उनके उस महान् कार्य के उच्च उद्देश्य की ओर ध्यान दें तथा उनके अपूर्व प्रयत्न और आत्मसमर्पण द्वारा प्राप्त सफलता में से उनकी व्यक्तिगत बुराइयों को भी कम करदें तो भी प्रत्येक देशभक्त हिन्दू उनके किये हुए कार्यों की अवश्य ही सराहना करेगा। मरहठा सरदार बालाजी विश्वनाथ अपने राज्य प्रबन्ध को सब प्रकार सुदृढ़ कर के तथा अपनी सैनिक शक्ति को पूर्णतया संगठित कर के इतना शक्तिशाली बन गया कि दिल्ली की शाही राजनीति में भी दखल देने का साहस करने लगा। उस समय उनको किसी भी मुसलमान शत्रु का भय न था, यहां तक कि स्वयं मुग़ल बादशाह भी अपने बागी सैनिकों तथा वज़ीरों से सुरक्षित रहने के लिये मरहठों से प्रार्थना किया करते थे और उनकी सहायता के भिक्षुक बने रहे थे। इस से यह स्पष्ट हो जाता है कि मरहठों के आन्दोलन ने मुसलमानी साम्राज्य को जड़ से उखाड़ कर शक्तिहीन कर दिया था। सन् १७१८ ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ तथा दाभाडे ने सैय्यद बन्धुओं का पक्ष लेकर उनके मुसलमानी प्रतिद्वंद्वियों के मुक़ाबले में १०,००० मरहठे सिपाहियों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान किया
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क्योंकि सैय्यद बन्धुओं ने पहिले से ही सारे दक्खिन पर चौथ व सर- देशमुखी वसूल करने का अधिकार मरहठों को दे दिया था। हिन्दुओं की पचास हज़ार सेना को अपनी राजधानी में प्रवेश करते हुए देख कर दिल्ली के मुसलमानों की क्रोधाग्नि भड़क उठी और वे मरहठे-सरदार को मार डालने के लिये षड्यन्त्र रचने लगे। उन्होंने यह निश्चय किया कि जिस समय बालाजी “स्वराज्य” तथा “चौथ” वसूल करने की सनद बादशाह से लेकर दरबार से निकलें, उसी समय धावा करके उन्हें मार डाला जाये। लेकिन क्या मरहठे जासूस इन बातों से अनभिज्ञ थे ? कदापि नहीं। ज्योंही उपर्युक्त समाचार मरहठों की सेना में पहुंचा त्योंही प्रसिद्ध सेनापति भानू अपने सरदार की रक्षा के लिये अपने प्राण देने के लिये कटिवद्ध हो गया अर्थात् यह निश्चय किया गया कि बादशाह से सनद लेकर बालाजी की पालकी किसी गुप्त राह से सेना में पहुंचाई जाय और भानू जी सजधज से बालाजी की पालकी में बैठ कर मुख्य द्वार से लौटे। अन्त में ऐसा ही किया गया। इधर मुसलमानों का क्रोध भरा झुण्ड बहुत देर से पेशवा की पालकी की ताक में था। पालकी पर नज़र पड़ते ही वह झुण्ड एकाएक मधुमक्खियों की तरह उन पर टूट पड़ा और थोड़े से मरहठा सैनिकों के साथ आते हुए, भानूजी को, उन्हें बालाजी समझ कर, फ़ौरन क़त्ल कर दिया। बाला जी बादशाही सनद को कांख के नीचे दबाये हुए किसी गुप्त राह से सकुशल अपने खेमे में पहुंच गया। भानू जी के इस प्रकार निस्वार्थ आत्मसमर्पण ने अपने जातीय इतिहास की धीरता, गौरव, प्रताप और महत्व को चार चाँद लगा दिये। इस प्रकार के महत्व- पूर्ण उदाहरणों को इस संक्षिप्त पुस्तक में जहां तहां दर्शाने का तात्पर्य यह है कि ऐसे जातीय और धार्मिक गौरव के थोड़े उदाहरण, रूखी समालोचनाओं से भरी दर्जनों मोटी किताबों की अपेक्षा, पाठकों के लिये विशेष लाभदायक होंगे।
[ ३४ ] ७. बाजीराव का कर्मक्षेत्र में पदार्पण दिल्ली से लौटते ही बालाजी विश्वनाथ का सन १७२० ई० में देहान्त होगया और उसका लड़का बाजीराव उनके स्थान पर, महाराष्ट्र मण्डल का नेता बना । उस समय मण्डल के सभापति शाहू जी थे । शिवाजी के पश्चात् बाजीराव का राजनैतिक क्षेत्र में उतरना महाराष्ट्र के इतिहास की एक दृढ़ मोड़ बनाता है। यद्यपि बड़ी बड़ी राजनैतिक समस्यायें अभी भी अधूरी पड़ी थीं तथापि महाराष्ट्र को राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त हो चुकी थी। मरहठे इतने शक्तिशाली और संगठित हो चुके थे कि वे देश और धर्म को हर प्रकार की आपत्ति से सुरक्षित रख सकते थे. और यदि चाहते तो शाही राजनीति में न उलझ कर केवल महा- राष्ट्र मण्डल पर ही सन्तोष करके भली भांति शांतिपूर्वक अकंटक राज- सुख भोग सकते थे। यह भाव कई एक नेताओं के हृदय में उत्पन्न भी हुआ और इसे उन्होंने छत्रपति शाहूजी के मन पर बिठाने का प्रयत्न भी किया, किन्तु वे असफल रहे। अगर उनका यह प्रयत्न सारी जाति पर सफल भी होजाता और वे उन लोगों को महाराष्ट्र सीमा के बाहर हिन्दुओं की स्वतन्त्रता की लड़ाई को रोकने के लिये उभारते भी, तो भी इस बात में शंका थी, कि जो कुछ उन लोगों ने विजय करके अपने अधीन किया था, उसका बहुत दिनों तक शांतिपूर्वक उपभोग कर भी सकते या नहीं। अथवा यदि वे महाराष्ट्र को सब प्रकार से सुरक्षित भी रख सकते और भारत के सभी दूसरे प्रान्तों से नाता तोड़ कर, एकांत स्वतन्त्र जीवन व्यतीत कर भी पाते तो प्रश्न यह उठता है कि क्या उन्हें ऐसा करना चाहिये था ? क्या उन लोगों ने केवल क्षुद्र सांसारिक सुख और शान्ति के लिए ही लगातार तीन पीढ़ियों तक घोर लड़ाई करके खून की नदी बहाई थी ? नहीं, ऐसी बात नहीं है और न ही ऐसा करना उनके लिए श्रेय था। क्या इसे सच्चा सुख कहा जा सकता था ? नहीं, नहीं