हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३१ ] ६. महाराष्ट्र-मण्डल "आहे तितुकें जतन करावें । पुढें आणिक मेळवावें ॥ महाराष्ट्रराज्यचि करावें । जिकडे तिकडे !!" ॐ --रामदास जिस समय औरङ्गजेब का जीवन, उसकी सारी आशा और इच्छाओं के नष्ट हो जाने के कारण, भार-सा हो रहा था और वह दुःख सागर में गोते खा रहा था, उस समय मरहठों ने अवसर पाकर खान देश, गोंडवान, बरार और यहां तक कि गुजरात आदि दूरस्थ प्रदेशों में युद्ध छेड़ दिया। उन्होंने शाहूजी को मुक्त करा लिया तथा दक्खिन के छः सूबों तथा मैसूर, ट्रावनकोर आदि रियासतों से भी, उन्हें लड़ाई में हराकर 'चौथ' और "सरदेशमुखी" वसूल करने लगे। अन्त में मुग़ल सम्राट् को झक मार कर महाराष्ट्र में मरहठों के स्वतन्त्र राज्य का स्वत्व मानना पड़ा। इससे मरहठों की शक्ति पहिले से अधिक बढ़ गई। इस प्रकार मरहठों को अपने घरों का उचित प्रबन्ध करने अपनी बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करने तथा व्यक्तिगत दलबन्दियों के भावों को मिटा कर सर्वसाधारण की इच्छानुसार, अपनी सारी स्वाभाविक और अनिवार्य कमज़ोरियों के होते हुए भी, एक संगठन सूत्र में बांधने का सुअवसर मिल गया, जिसका फल ऐसा उत्तम निकला कि महा- राष्ट्र-मण्डल या कॉन्फिडरेसी-सच्चे अर्थों में "हिन्दू-पद-पादशाही" ब- गई। यह केवल नाममात्र को ही नहीं वरन् वास्तविक रूप में सारे भारतवर्ष पर राज्य करने लगी। जिन व्यक्तिगत त्रुटियों और दुर्बलताओं की ओर मैंने ऊपर संकेत किया है ये वास्तविक ही थीं, क्योंकि ऐसी त्रुटियां सब हिन्दुओं के भीतर अब भी वर्त्तमान हैं। हम आगे चलकर पाठक- ॐ जो कुछ तुम्हारे पास है उसे बचाओ और उसकी वृद्धि के लिए प्रयत्न करो। सब ओर महाराष्ट्र साम्राज्य का प्रसार करो।