भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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को एक एक करके इनको बताने की चेष्टा करेंगे। सब भ्रमों को दूर करने के लिए यह कह देना ही पर्याप्त होगा कि जितना उनके विषय में हमें ज्ञान है उतना और किसी को न होगा। जब हम उन महान् राष्ट्रीय तथा धार्मिक सिद्धान्तों पर दृष्टि डालते हैं तथा उन का प्रकटी- करण करते हैं जिन्हों ने मरहठा जाति को हिन्दू स्वतन्त्रता के युद्ध को जीतने के लिए प्रयत्नशील बनाया उस समय हम उस तथ्य को भुलाना या कम करके दिखाना नहीं चाहते कि कभी कभी विशेष अवसरों पर व्यक्तिगत द्वेष की आग तथा स्वार्थ और लालच भी उनको अपने जातीय कर्तव्य तथा प्रवृत्ति से विचलित कर देता था। यदि उनमें ये अवगुण न होते तो वे मनुष्यों के स्थान पर देवताओं की जाति बन जाती। यदि हम उनके उस महान् कार्य के उच्च उद्देश्य की ओर ध्यान दें तथा उनके अपूर्व प्रयत्न और आत्मसमर्पण द्वारा प्राप्त सफलता में से उनकी व्यक्तिगत बुराइयों को भी कम करदें तो भी प्रत्येक देशभक्त हिन्दू उनके किये हुए कार्यों की अवश्य ही सराहना करेगा। मरहठा सरदार बालाजी विश्वनाथ अपने राज्य प्रबन्ध को सब प्रकार सुदृढ़ कर के तथा अपनी सैनिक शक्ति को पूर्णतया संगठित कर के इतना शक्तिशाली बन गया कि दिल्ली की शाही राजनीति में भी दखल देने का साहस करने लगा। उस समय उनको किसी भी मुसलमान शत्रु का भय न था, यहां तक कि स्वयं मुग़ल बादशाह भी अपने बागी सैनिकों तथा वज़ीरों से सुरक्षित रहने के लिये मरहठों से प्रार्थना किया करते थे और उनकी सहायता के भिक्षुक बने रहे थे। इस से यह स्पष्ट हो जाता है कि मरहठों के आन्दोलन ने मुसलमानी साम्राज्य को जड़ से उखाड़ कर शक्तिहीन कर दिया था। सन् १७१८ ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ तथा दाभाडे ने सैय्यद बन्धुओं का पक्ष लेकर उनके मुसलमानी प्रतिद्वंद्वियों के मुक़ाबले में १०,००० मरहठे सिपाहियों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान किया