हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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क्योंकि सैय्यद बन्धुओं ने पहिले से ही सारे दक्खिन पर चौथ व सर- देशमुखी वसूल करने का अधिकार मरहठों को दे दिया था। हिन्दुओं की पचास हज़ार सेना को अपनी राजधानी में प्रवेश करते हुए देख कर दिल्ली के मुसलमानों की क्रोधाग्नि भड़क उठी और वे मरहठे-सरदार को मार डालने के लिये षड्यन्त्र रचने लगे। उन्होंने यह निश्चय किया कि जिस समय बालाजी “स्वराज्य” तथा “चौथ” वसूल करने की सनद बादशाह से लेकर दरबार से निकलें, उसी समय धावा करके उन्हें मार डाला जाये। लेकिन क्या मरहठे जासूस इन बातों से अनभिज्ञ थे ? कदापि नहीं। ज्योंही उपर्युक्त समाचार मरहठों की सेना में पहुंचा त्योंही प्रसिद्ध सेनापति भानू अपने सरदार की रक्षा के लिये अपने प्राण देने के लिये कटिवद्ध हो गया अर्थात् यह निश्चय किया गया कि बादशाह से सनद लेकर बालाजी की पालकी किसी गुप्त राह से सेना में पहुंचाई जाय और भानू जी सजधज से बालाजी की पालकी में बैठ कर मुख्य द्वार से लौटे। अन्त में ऐसा ही किया गया। इधर मुसलमानों का क्रोध भरा झुण्ड बहुत देर से पेशवा की पालकी की ताक में था। पालकी पर नज़र पड़ते ही वह झुण्ड एकाएक मधुमक्खियों की तरह उन पर टूट पड़ा और थोड़े से मरहठा सैनिकों के साथ आते हुए, भानूजी को, उन्हें बालाजी समझ कर, फ़ौरन क़त्ल कर दिया। बाला जी बादशाही सनद को कांख के नीचे दबाये हुए किसी गुप्त राह से सकुशल अपने खेमे में पहुंच गया। भानू जी के इस प्रकार निस्वार्थ आत्मसमर्पण ने अपने जातीय इतिहास की धीरता, गौरव, प्रताप और महत्व को चार चाँद लगा दिये। इस प्रकार के महत्व- पूर्ण उदाहरणों को इस संक्षिप्त पुस्तक में जहां तहां दर्शाने का तात्पर्य यह है कि ऐसे जातीय और धार्मिक गौरव के थोड़े उदाहरण, रूखी समालोचनाओं से भरी दर्जनों मोटी किताबों की अपेक्षा, पाठकों के लिये विशेष लाभदायक होंगे।