हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३४ ] ७. बाजीराव का कर्मक्षेत्र में पदार्पण दिल्ली से लौटते ही बालाजी विश्वनाथ का सन १७२० ई० में देहान्त होगया और उसका लड़का बाजीराव उनके स्थान पर, महाराष्ट्र मण्डल का नेता बना । उस समय मण्डल के सभापति शाहू जी थे । शिवाजी के पश्चात् बाजीराव का राजनैतिक क्षेत्र में उतरना महाराष्ट्र के इतिहास की एक दृढ़ मोड़ बनाता है। यद्यपि बड़ी बड़ी राजनैतिक समस्यायें अभी भी अधूरी पड़ी थीं तथापि महाराष्ट्र को राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त हो चुकी थी। मरहठे इतने शक्तिशाली और संगठित हो चुके थे कि वे देश और धर्म को हर प्रकार की आपत्ति से सुरक्षित रख सकते थे. और यदि चाहते तो शाही राजनीति में न उलझ कर केवल महा- राष्ट्र मण्डल पर ही सन्तोष करके भली भांति शांतिपूर्वक अकंटक राज- सुख भोग सकते थे। यह भाव कई एक नेताओं के हृदय में उत्पन्न भी हुआ और इसे उन्होंने छत्रपति शाहूजी के मन पर बिठाने का प्रयत्न भी किया, किन्तु वे असफल रहे। अगर उनका यह प्रयत्न सारी जाति पर सफल भी होजाता और वे उन लोगों को महाराष्ट्र सीमा के बाहर हिन्दुओं की स्वतन्त्रता की लड़ाई को रोकने के लिये उभारते भी, तो भी इस बात में शंका थी, कि जो कुछ उन लोगों ने विजय करके अपने अधीन किया था, उसका बहुत दिनों तक शांतिपूर्वक उपभोग कर भी सकते या नहीं। अथवा यदि वे महाराष्ट्र को सब प्रकार से सुरक्षित भी रख सकते और भारत के सभी दूसरे प्रान्तों से नाता तोड़ कर, एकांत स्वतन्त्र जीवन व्यतीत कर भी पाते तो प्रश्न यह उठता है कि क्या उन्हें ऐसा करना चाहिये था ? क्या उन लोगों ने केवल क्षुद्र सांसारिक सुख और शान्ति के लिए ही लगातार तीन पीढ़ियों तक घोर लड़ाई करके खून की नदी बहाई थी ? नहीं, ऐसी बात नहीं है और न ही ऐसा करना उनके लिए श्रेय था। क्या इसे सच्चा सुख कहा जा सकता था ? नहीं, नहीं