हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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कदापि नहीं। शिवाजी ने जिस हिन्दू-पद-पादशाही की नींव डाली थी, उसका उद्देश्य केवल महाराष्ट्र-मात्र के लिये ही न था, बल्कि सारे भारत- वर्ष के लिये एक-सा था और उनके इसी पवित्र उद्देश्य के परिपोषक उनके सारे साथी थे। यह बात तो सच है कि महाराष्ट्र के हिन्दू विदे- शियों के शासन से छुटकारा पा चुके थे, पर अब भी करोड़ों हिन्दू भिन्न- भिन्न प्रान्तों में वर्तमान थे, जो विदेशियों के शासन से असन्तुष्ट और दुखी थे। गुरु रामदास ने तो यह उपदेश दिया था कि--"धर्मासाठीं मरावें" (धर्म के लिये मरो)। और इस बात पर उन्होंने शोक प्रकट किया था कि "तीर्थक्षेत्रें भ्रष्ट झालीं !" (अर्थात् हमारे तीर्थस्थान अपवित्र किये गये हैं)। ऐसी दशा में मरहठे यदि अपने प्रान्त पर ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते तो शिवाजी महाराज का उद्देश्य तथा महात्मा रामदासजी का पवित्र उपदेश निष्फल होजाता और स्वर्ग में भी उनकी आत्माओं को शान्ति न मिलती। भला इस उच्च ध्येय को ध्यान में रखते हुए मरहठे क्योंकर चुपचाप बैठ सकते थे जबकि यवनोंकी हलाली ध्वजा अब भी बड़े गौरवके साथ पवित्र काशी-क्षेत्र मे विश्वनाथ के मन्दिर पर फहरा रही थी। फिर ऐसी दशा में हम किस प्रकार मान सकते हैं कि शिवाजी का हिन्दू-पद-पादशाही का आन्दोलन पूर्ण होचुका था, जबकि दिल्ली में धर्मराज युधिष्ठिर के पवित्र सिंहासन पर मुग़ल विराज रहे हों !
मरहठे पन्धारपुर के मुसलमानी राज्य को जीत कर वहां से हलाली ध्वजा को उखाड़ कर फेंक चुके थे और अब नासिक को धर्मान्ध मुसलमान अपमानित नहीं कर सकते थे। किन्तु उधर काशी, रामेश्वर, कुरु- क्षेत्र और गंगा सागर की क्या दशा थी ? इस पर ध्यान दीजिये। वहाँ यवनोंकी ध्वजा उड़ रही थी। क्या ये तीर्थ उतने ही पवित्रन थे जितने कि पन्धार और नासिक ? उनके पूर्वजों की अस्थियां केवल गोदावरी में ही नहीं पड़ी थीं; बल्कि गंगा में भी पड़ी थीं। उनके देवमन्दिर हिमालय से लेकर रामेश्वर तक और द्वारिका से लेकर जगन्नाथ तक सारे भारत में फैले