भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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टापों से धूल उड़ाते, विजय प्राप्त करते, सिन्ध के किनारे तक पहुंचे अर्थात् जब एक महादेश को उन्होंने अपनी छत्रछाया में कर लिया। शिवाजी के देहान्त के समय मुग़ल बादशाह औरङ्गज़ेब जीवित था। उसके हृदय में हिन्दुओं के प्रति घृणा के भाव भी वर्त्तमान थे। उन घृणा के भावों का सत्यानास करने के लिये शिवाजी ने आजन्म सुख की नींद न ली थी और उन की यह उत्कट इच्छा उनके साथ स्वर्गगामिनी हुई। किन्तु शिवाजी के उत्तराधिकारिणी महाराष्ट्र जाति ने अपने पूर्वजों पर किये गये विधर्मियों के अत्याचारों का बदला ब्याज सहित उन से लिया और औरङ्गज़ेब को, उसके हिन्दुओं के प्रति घृणा के भावों सहित अहमदनगर की क़ब्र में दफ़न किया तथा हिन्दू-धर्म को काल के गाल से छुड़ाया। ज़रा ध्यान दीजिये कि यदि ऐसा न हुआ होता तो जो स्वराज्य का बीज रायगढ़ में शिवाजी के हाथों बोया गया था, वह कभी भी एक विशाल वृक्ष रूपी राज्य के स्वरूप में दिखाई न देता, वरन् निरर्थक काल की धूल में नष्टभ्रष्ट हो जाता और कभी फूल और फल न सकता। शिवाजी महाराज ने तो केवल रायगढ़ पर राज्य किया, पर उनके उत्तराधिकारियों के लिये भारत की प्राचीन राजधानी दिल्ली पर राज्य करने के दिन सन्निकट थे। यह कहना अत्युक्ति-पूर्ण न होगा कि यदि धनाजी, सन्ताजी, बालाजी, बाजीराव, भाऊ, मलहरराव, दत्ताजी, माधवराव, परशुरामपन्त और बापूजी जैसे महान व्यक्ति क्रमशः समयानुकूल अपना सिर न उठाते और रणक्षेत्र में अपना कौशल न दिखाते तथा देश और धर्म के लिये बलिदान न देते, तो महाराज शिवाजी का मनोरथ अधूरा ही पड़ा रहता और जो उन्होंने अपने जीवन में सफलता प्राप्त की थी वह जनसमाज में वैसी ही साधारण हो जाती जैसी कि पटवर्द्धन या बुन्देलाराज्य स्थापित करने वाले नेताओं की हुई, तथा हमें हिन्दू-इतिहास में शिवाजी को ऐसे अनुपम प्रतिष्ठा और गौरवपूर्ण पदपर आरूढ़ देखने का अवसर न मिलता।