भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

[Header] २७ ] रामचन्द्र पन्त, शङ्करजी मल्हार, परशुराम त्र्यम्बक, सन्ता जी घोरपाड़े, धानाजी यादव, खण्डेराव दभाड़े, निम्बालकर नेमाजीपरसोज़ी, ब्राह्मण, आदि मरहठे, नेतागण तथा राजकुमार और किसान--अथवा यों कहिये कि सारी जाति ही मुसलमान शत्रुओं के विरोध में सशस्त्र खड़ी हो गई। उस समय तक पुनः सारा दक्षिण औरङ्गज़ेब के अधीन हो चुका था। सारा महाराष्ट्र, इसके प्रसिद्ध किले, यहां तक कि स्वयं शिवाजी की पवित्र राजधानी भी मुसलमान सेनापतियों के सैनिक शासन के हाथों दुःखित हो रही थी। यही जान पड़ता था कि शिवाजी तथा उनके वंशजों ने व्यर्थ ही इसके लिये लड़कर अपने प्राण गंवाये थे। लेकिन किले और राजधानी पास नहीं तो क्या हुआ! जो जात अपनी स्वाधीनता प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखती हो, वह अपना किला अपने हृदय में बना सकती है। उसका उच्च आदर्श ही जातीय ध्वजा का काम देता है और जहां कहीं जाकर फहराता है, वही उसकी राजधानी बन जाती है। इस उच्च विचार ने सारे महाराष्ट्र-वासियों के हृदय में एक नवीन ज्योति पैदा कर दी। उन्होंने युद्ध को एक क्षण के लिये भी बंद न करने का दृढ़ निश्चय कर लिया और वे कहने लगे- "यदि हम लोगों के हाथ से महाराष्ट्र खो गया है तो क्या हुआ, चलो मद्रास में चलकर लड़ाई छेड़ें। यदि रायगढ़ हाथ से निकल गया है तो हिन्दू-पद-पादशाही का झण्डा जिनजी में चलकर गाड़ दें और लड़ाई एक दिन के लिये भी बन्द न करें।" इस प्रकार की प्रौढ़ प्रतिज्ञा करके, मरहठे मुगलसम्राट्-औरङ्गज़ेब की विशाल सेना से लगभग २० वर्ष तक लड़ते रहे। अन्त में उसे निराश और हार कर महाराष्ट्र तथा दक्खिन से भाग जाने पर विवश होना, इसी शोक में दुखी होकर वह सन् १७०७ ईस्वी के साल अहमदनगर में मर गया। मरहठों की अद्भुत युद्ध कला जिसे "गनिमी कावा' कहते हैं, इस लम्बी लड़ाई में विशेष लाभदायक सिद्ध हुई। बिजली की तरह चंचलता, वीरता और साहस के साथ मरहठा सेना, अद्वितीय सेनापतियों

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