भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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की अध्यक्षता में, कभी एकत्रित होती, कभी छिटपुट रहती; कभी आक्रमण करनी, कभी पीछे हट जाती; कभी आगे बढ़ती, कभी पीछे पांव धरती; कभी लड़ती, कभी भागती; कभी लड़ाई में पांव जमाती। इस युद्ध कौशल ने मुगलों को खूब सताया और उन्हें हर जगह से दुम दबा कर भाग जाना पड़ा। इस प्रकार विचित्र लड़ाई लड़कर मरहठों ने मुगलों के साहस को चूर्ण कर धूल में मिला दिया। प्रत्येक नामी मुसलिम सेनापति और नायक को या तो परास्त किया गया या अपमानित किया गया। उन्हें या तो कैदी बना लिया अथवा मार डाला गया। जुलफिकार खां, अली मरदान खां, हिम्मत खां और कासिम खां आदि मुग़ल सेनापतियों को मरहठे सरदारों धानजी, मन्ताजी आदि ने जिनजी, कावेरीपाक, दुगारी और अन्य दूसरे युद्धस्थलों में ऐसा बुरी तरह हराया कि उनकी सेना छिन्न- भिन्न हो गई, जिससे मुग़ल बादशाह औरङ्गज़ेब को महाराष्ट्र विजय करने की इच्छा फिर स्वप्न में भी न हुई। इस प्रकार मरहठे शत्रुओं का दमन करते हुए आगे बढ़े और उन्होंने सीधा मुग़लों की शाही छावनियों पर धावा बोल दिया, दूसरे शब्दों में उन्होंने सिंह को उसकी मांद ही में आकर ललकारा। बादशाह ज़िन्दा ही पकड़ा जाता, यदि भाग्यवश अपने बादशाही सुनहरी खेमे से भाग न गया होता। मरहठों ने खेमें पर अपना अधिकार कर लिया और उसे उखड़वा कर अपने साथ ले आये। इस समय सभी मरहठे सेनापतियों के हृदय में देशभक्ति का अपूर्व उत्साह भरा हुआ था, जो निम्नलिखित बातों से स्पष्ट हो जायगा-- प्रसिद्ध सेनापति खाएडोचल्लाल ने उन मरहठा सरदारों को, जो कि अभी जिनजी को घेरने में मुग़लों का साथ दे रहे थे, अपनी ओर मिलाने का कठोर परिश्रम और प्रयत्न किया। परोक्ष रीति से उन्होंने नागोजी राजे के साथ, उसे अपनी ओर करने के लिये, पत्र व्यवहार