हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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को हाथ से न जाने देने का निश्चय किया। काबुल से लेकर बंगाल तक फैले हुए साम्राज्य के जन-धन के विस्तृत साधन उसके अधिकार में थे। अतः वह तीन लाख की सेना लेकर दक्षिण पर चढ़ आया। शिवा जी को भी कभी अपने जीवन काल में इतनी सेना का सामना न करना पड़ा था। औरंगज़ेब ने अन्दाज़ा लगाने में भूल नहीं की थी, क्योंकि सारे मुग़ल साम्राज्य की यह सुसंगठित शक्ति मरहठों की ऐसी असंगठित रियासत से दसगुना बड़े राज्य का भी अनायास नाश कर सकती थी। मुग़लों की ऐसी सुसंगठित शक्ति का मुकाबला करने के लिए मरहठों को ऐसा नेता मिला जो कि एक महान् राष्ट्र का पथ-प्रदर्शन करने के नितान्त अयोग्य था। संभाजी अयोग्य ही नहीं वरन दुष्ट प्रकृति भी था, और इन उपरोक्त अवगुणों के होते हुए भी, संभाजी ने अपने मरणकाल तक ऐसी निर्भीकता दिखाई, जो उस के सारे अवगुणों को मिटा कर उसे शिवाजी का एक सुपुत्र तथा हिन्दू-आन्दोलन का एक महान् व्यक्ति प्रमाणित करती है। जिस समय वह औरंगज़ेब के दरबार में एक विवश कैदी के रूप में खड़ा था और विधर्मी उसे मुसलमान हो जाने के लिये विवश कर रहे थे, कदाचित् उस जैसी बुरी प्रकृति वाला पुरुष मृत्यु के भय से तथा दुष्टों के लोभ या यातना से अपने धर्म को तिलाञ्जलि देने में ज़रा भी नहीं हिचकता, पर वाह रे संभाजी! यह तुम्हारा ही दृढ़ हृदय था, जो ऐसे संकटमय समय आ पड़ने पर भी तुमने शत्रुओं को भरे दरबार में निर्भयता पूर्वक मुंह तोड़ जवाब दिया और इस घृण्य कर्म को उपेक्षा करके मृत्यु का आनन्दपूर्वक हंसते २ स्वागत किया, और अपने पूर्वजों की धर्मभक्ति का पूर्ण समर्थन किया तथा अन्यायी मुसलमानों के ज्ञान तथा उनकी धर्म पुस्तकों की घोर निन्दा की जिससे औरंगज़ेब को अनुभव हो गया कि वह इस मरहठे शेर को क्षुद्र कुत्ते की तरह वशीभूत नहीं कर सकता। अंततः उसने अपने सारे प्रयत्नों को विफल होता जान कर आज्ञा दी कि इस काफ़िर को मार डाला जाये। औरंगज़ेब