भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

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हिंदुओं का नाम भी शेष रहता या न, यह अनुमान करना असम्भव है। कहीं २ पर मरहठे सिपाहियों ने कुछ कुछ अनुचित कार्य भी किया है; किंतु हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि ये अपराध उन अपराधों के सामने कुछ भी नहीं हैं जिन्हें मुसलमानों, पूर्वगों और दूसरे राष्ट्रों ने, जिन से मरहठों को लड़ना पड़ा, किये और जो क्षमा योग्य समझे गये थे, और कभी कभी तो वे उचित भी माने गये थे। मरहठों ने तो उन मौलवियों को भी, जो कि हिंदुओं को बलात् मुसलमान बनाने के अप- राधी थे, कभी ज़बरदस्ती हिंदू-धर्म ग्रहण करने के लिये बाधित नहीं किया यद्यपि उस समय उनमें भी ऐसा कर सकने की शक्ति थी। यद्यपि वे इस बात को भली भांति जानते थे कि उनके देवमन्दिर 'अल्लाह' की शक्ति दिखलाने के लिये गिराये गये थे, तथापि उन्होंने उनके बदले में राम और कृष्ण की शक्ति दिखलाने के लिये मसजिदों और गिरजाघरों को गिराना पाप समझा। जहां तक उनके धार्मिक अत्याचारों का सम्बन्ध है उनका कट्टर से कट्टर शत्रु भी उन्हें कत्ले आम का दोषी नहीं ठहरा सकता। न तो उन्होंने स्त्रियों के सतीत्व ही भ्रष्ट किये और न हठधर्मी बनकर लोगों को दुःख ही दिये और न शत्रुओं के धार्मिक ग्रन्थों ही को जलाया। हां, उन्होंने लड़ाई का खर्च शत्रुओं के मुल्कों से अवश्य ही वसूल किया, और सैनिक आवश्यकता के अनुसार भोजन सामग्री इत्यादि का नाश अवश्य किया और मुल्कों को उजाड़ा। इन ही बातों को शत्रुओं ने लूट का नाम दिया। केवल यह ही दोष शत्रु उनके विरुद्ध लगा सकते हैं। यह साधन उनके लिये कितना आवश्यक शस्त्र था यह इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि जब विदेशियों ने आक्रमण किया तब वे इस शस्त्र को अपने प्रति भी काम में लाने के लिये उद्यत हो गये थे। महाराज राजाराम के समय में जब औरंगज़ेब ने आक्रमण किया और दो बार अंग्रेजों ने पुनः ले लेने का प्रयत्न किया तो उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी क्योंकि मरहठों ने अपने देश छोड़ देने तथा उन्हें उजाड़