भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

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देने में जरा भी आगा पीछा नहीं सोचा था, बल्कि उन्होंने तो यहां तक ठान लिया था कि यदि अंग्रेज़ पूना तक आ गये तो वे इसे भी जला देंगे। इसलिये यह भली भांति स्पष्ट हो गया कि वे शत्रुओं के राज्य पर इस लिये आक्रमण कभी नहीं करते थे कि वे दूसरे देशों के हिन्दुओं से घृणा करते थे अथवा उन्हें किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाना चाहते थे। यह भी बात तभी तक रहती थी जब तक कि मरहठों की मांग पूरी नहीं होती थी, या युद्ध समाप्त न हो जाता था। ज्यों ही कोई प्रांत ठीक प्रकार से हिंदू-साम्राज्य में मिला लिया जाता अथवा कर देने वाला राज्य बना दिया जाता था, मरहठे आक्रमण करना बन्द कर देते थे। जिस स्थान के लोगों ने मरहठों को मुसलमान या अंग्रेजों के बन्धन से अपने को मुक्त कराने के लिये बुलाया या जहां के निवासी मरहठों के साथ विदे- शियों के विरोध में खड़े हुए, मरहठों ने उनका पूरा साथ दिया तथा उनके साथ सदैव बड़े प्रेम का बर्ताव करते रहे। कहीं कहीं पर मरहठों ने अति की। उसकी हमें अवश्य निंदा करनी होगी; किन्तु हमें विचार करना चाहिये कि ऐसी ज़्यादतियां गेरीवाल्डी के रोम से लौटने पर, फ्रांस की राष्ट्रीय क्रांति में, आयरलैंड के सीनफीन में, अमेरिका की स्वतन्त्रता की लड़ाई और जर्मनी के आज़ादी के युद्ध में अनेकों पाई जाती हैं। जिस प्रकार उपरोक्त घटनाओं के कारण यूरोपीय देशों का राष्ट्रीय गौरव कुछ भी कम नहीं हुआ, उसी प्रकार मरहठों ने भी कहीं कहीं पर जो अनुचित व्यवहार किये हैं, उनके कारण महाराष्ट्र का गौरव कम समझना भूल है। कारण कुछ तो ऊपर बतला ही दिया गया है और विशेष यह है कि जो अत्याचार विदेशियों ने हिन्दुओं तथा मरहठों पर किये, उनके सामने मरहठों द्वारा किये गये अत्याचार कुछ भी नहीं। जिस आन्दोलन ने शताब्दियों से दासता की धूल में पड़े हुए हिन्दुओं की ध्वजा को उठाकर खड़ा किया; राजाओं, महाराजाओं, नवाबों और बादशाहों का प्रबल सामना करके अटक में

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