हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 7, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें६ ] बहा सकें। इतिहास का काम तो उन मूल कारणों की खोज करना है, जो झगड़े, फ़साद और खूंरेज़ियों को मिटाकर, मनुष्य को मनुष्य से— जो एक ही प्रभु के पुत्र हैं और एक ही माता वसुन्धरा की गोद में पले हैं—मिला दें, और अन्ततः सार्वभौम मानव-प्रजातन्त्र स्थापित कर सकें। परन्तु दूसरी ओर, इस दूरस्थ आशा की चमक से हमारी आँखें चुंधिया कर इस सनातन सत्य को ओझल न कर दें कि इस संसार में मनुष्य और जातियां समुदायों में बंटी हुई हैं और, युद्ध और संघर्ष की भट्टी में से गुजर कर ही परस्पर एकरूप हो सकती हैं। जो जातियाँ इस कठिन परीक्षा में अपनी नैतिक और शारीरिक योग्यता के बल पर सफल होती हैं, उन्हें ही संसार में जीने का अधिकार है। अतः एकता की दुहाई देने से पहले अपने को एक जीवित राष्ट्र की हैसियत में खड़े देख लेना उचित होगा। इसी कठिन कसौटी पर पूरा उतरने के लिये हिन्दुओं को मुसलमानों से भीषण संघर्ष करना पड़ा। स्वामी और गुलाम में आदरपूर्ण मेल नहीं हो सकता। यदि हिन्दुओं ने उठकर अपनी शक्ति का परिचय न देकर अपने पर किए गए अत्याचारों का मुंहतोड़ उत्तर न दिया होता, तो उस समय मुसलमान मित्रता का हाथ बढ़ाते भी, तो उसमें मित्रता की अपेक्षा दया का भाव होता था! और हिन्दू भी उसे आत्म-विश्वास, अधिकार और समानता से न ग्रहण कर सकते थे। मित्रता समान शक्तियों में होती है। सच पूछो तो, उस महान संघर्ष ने ही, जो कि हिन्दुओं ने देश और धर्म की रक्षा के लिये किया, इन दो बड़ी शक्तियों में परस्पर समान मित्रता का द्वार खोल दिया। इसी कारण अपनी पुस्तक 'सन् १८५७ का स्वातन्त्र्य-संग्राम' में मैंने लिखा था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल उस दिन से थोड़ी बहुत संभव होने लगी जब सन् १७६१ में हिन्दू राष्ट्र के वीरों ने दिल्ली में विजय-पताका लहराई और मुग़लों का तख़्त, ताज और झण्डा वीर सेनानी भाऊ और नवयुवक विश्वास राव के चरणों में टुकड़े टुकड़े हो कर धूल में मिल गया। क्योंकि उस दिन हिन्दुओं ने अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता प्राप्त की और इस विश्व के रंग-मंच पर एक जीवित राष्ट्र