हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ६६ झर झर कर गिर पड़ते हैं साथ ही केश लट भी (कबरी से) अलग ही लटक रही है। हे प्यारी ! छिपाती क्यों हो ? वक्ष स्थल पर चिह्नित नख रेखा कितनी स्पष्ट देख रही हूँ मैं और सुकुमारी के अधर फीके हो चुके हैं एवं सुन्दर कपोलों पर पीक भी अङ्कित है।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र [सखी भाव से] कहते हैं "अहो रसिक मणि भामिनि ! तेरे अङ्ग-अङ्ग में कितना भारी आलस्य है, [जो रात्रि के जागरण एवं रति श्रम का द्योतक हैं।"] – २२ – अवतरण—स्वामिनि श्रीराधा नित्य परम सौन्दर्य मयी हैं। उनके एक एक अङ्ग सौन्दर्य एवं माधुर्य के निधान हैं किन्तु इस पद में केवल उनके स्वाभाविक अभिराम नयनों के सरस लावण्य, माधुर्य और चाञ्चल्यादि गुणों का वर्णन है जो सुख समुद्र और मन रञ्जन हैं। स्तुति व्याज से आचार्य्य चरण कहते हैं- मूल- नैननिं पर वारौं कोटिक खंजन। चंचल चपल अरुन अनियारे, अग्र भाग बन्यौ अंजन॥ रुचिर मनोहर बंक बिलोकनि, सुरत समर दल गंजन। (जै श्री) हित हरिवंश कहत न बनै छबि, सुख समुद्र मन रंजन॥२२॥ भावार्थ – (हे राधे ! तुम्हारे) नयनों पर मैं कोटि कोटि खञ्जनों को भी न्यौछावर कर दूँ। (कितने सुन्दर हैं तुम्हारे नयन ?) चञ्चल हैं, चपल हैं- अत्यन्त चपल हैं, अरुण है और अनियारे-कोर दार भी। तिस पर उनके अग्र भाग में और अञ्जन भी लग रहा है। इन नयनों का रुचिर, मनोहर एवं कटाक्ष पूर्ण बक्र (तिरछा) (नयन नोकों से) अवलोकन तो सुरत युद्ध में (विपक्षी) दल का मथन ही करने वाला है।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं-"सखी! इनकी छवि तो कुछ कहते ही नहीं बनती। अरी ! ये तो सुख समुद्र हैं और मन का रञ्जन करने वाले भी।"