भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

हित चौरासी • • १०१ सुभ कौसेय कसिब कौस्तुभ मनि पंकज सुतनि लै अंगनि लुपाऊँ। हरषित इंदु तजत जैसें जलधर, सो भ्रम ढूँढ़ि कहाँ हौं पाऊँ ?? अंबु न दंभ कछू नहिं व्यापत हिमकर तपै ताहि कैसे कैं बुझाऊँ ? (जै श्री) हित हरिवंश रसिक नवरँग पिय भृकुटि भौंह तेरे खंजन लराऊँ।। देखिये, इस पद के शब्द कितने सरल हैं किन्तु अर्थ और भाव शृङ्खला की समस्या कितनी जटिल है? बड़े बड़े दिग्गज साहित्यिक यहाँ पानी भरते हैं। अस्तु, श्रीहिताचार्य्य महाप्रभु के सम्पूर्ण काव्य में स्थान स्थान पर ऐसे ही विचित्र प्रयोग देखे जाते हैं, जो पाठकों को आश्चर्य में डाल देते हैं। यहाँ ऐसे प्रसङ्गों के कुछ उदाहरण दिये जाते हैं- (१) <u>चंचल</u> <u>चपल</u> अरुन अनियारे, अग्र भाग बन्यौ अंजन। (२) (जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि, संभ्रम देत <u>भ्रमरनि</u> <u>अलिन</u> री। (३) <u>परिरंभन</u> चुंबन <u>आलिंगन</u> उचित जुवति जन पायौ। (४) अंग राग <u>परिधान</u> <u>वसन</u> लागत ताते जु पीत पट। इन उदाहरणों में रेखाङ्कित शब्द दृष्टव्य हैं। और भी ऐसे अनेकों प्रयोग हैं, जिनमें दो समानार्थी शब्द एक ही प्रयोग में सङ्कलित हैं, परन्तु वे निरर्थक नहीं वरं सार्थक और साभिप्राय हैं। एक तो यही कि प्रत्येक शब्द अपना स्वतंत्र अर्थ जो कुछ और जैसा कुछ रखता है वह उसका अपना है और दूसरे समानार्थी से विशेष कुछ भाव अवश्य रखता है चाहे भले दूसरे के समान हो। अतः ऐसे दो समानार्थी शब्दों