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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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१४ • • हित चौरासी गुरु सहचरि गोवर्धन स्वामिनि परस्यौ पदनि कृपा भयौ हंश। प्रेम पुलक तन मन आनन्दित रतनदास के हिय अवतंश॥ परम भागवत स्वामी श्री हितदास जी महाराज वन्दे तारा तनय मुदारम। आगम निगम अलक्ष्य अगोचर, प्रगटित विसद सु विपिन विहारम्॥ रसिक सभा मंडन रस भूषण, निज हित रीति प्रीति विस्तारम्। श्रीराधा रति केलि कुंज रस, रसिक अनन्य वहन रसभारम्॥ निरभिमान करुना-वरुनालय, आरत सरनागत प्रतिपारम्। 'नेहलता हित' देहि दयामय, निज पद-पल्लव रसघन सारम्॥ श्री हित चौरासी वाणी प्रशस्ति गो. श्री हित रूपलाल जी महाराज भव-जल-निधि कौ नाव काम पावक कौ पानी। प्रेम-भक्ति कौ मूल मोद मंगल सुखदानी॥ निगम सार सिद्धांत संत विश्राम मधुर वर। रसिकन कौ रस-सार सकल अक्षर रस कौ घर॥ चौरासी (श्री) 'हरिवंश' कृत पढ़ै सुनै निसि-भोर। छुटै-चौरासी भ्रमनि तें निरखै जुगल किशोर॥ निरखै जुगल किशोर भोर अरु रैन न जानै। पियै रूप रस मत्त भयौ कछु मनहि न आनै॥ प्रेम लक्षना भक्ति होय हिय आनन्द कारी। अरु वृन्दावन वास सखी सुख कौ अधिकारी॥ कुञ्ज महल की टहल सुख सम्पत्ति दम्पति पाइहै। (जयश्री) रूप लाल हित प्रीति सौ जो चौरासी गाइहै॥

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