भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

१६४ • • हित चौरासी सारङ्ग मूल-बनी वृषभानु नंदिनी आजु। भूषन वसन विविध पहिरे तन पिय मोंहन हित साजु।। हाव भाव लावन्य भृकुटि लट हरति जुवति जन पाजु। ताल भेद औघर सुर सूचत नूपुर किंकिनि बाजु।। नव निकुंज अभिराम स्याम सँग नीकौ बन्यौ समाजु। (जै श्री) हित हरिवंश विलास् रास जुत जोरी अविचल राजु।।४८।। भावार्थ-आज श्रीवृषभानु नन्दिनी कैसी सुन्दर बनी हैं। उन्होंने अपने प्रियतम मोहन के लिये विविध भूषण वस्त्र सज्जित करके अपने श्रीवपु में धारण कर रखे हैं। वे (रास में अपने) हाव भाव, लावण्य एवं भृकुटियों के नर्तन से युवति जनों के (सौन्दर्य) अभिमान को हरण कर रही हैं। (नृत्य में) ताल, भेद एवं अवघर स्वर की सूचना वे केवल अपने नूपुर किङ्किणियों की झनकार (शब्द) मात्र से कर रही हैं। श्री हित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं आज अभिराम नव निकुञ्ज में श्याम सुन्दर के साथ (आपका) बड़ा ही सुन्दर समाज (सामञ्जस्य) बना है। इस प्रकार यह जोड़ी (सर्वदा) रास एवं विलास से युक्त रह कर अविचल रूप से विराज रही है-शोभित है।

  • ४९ - अवतरण-इस पद में श्रीहित सखी जी अपनी सखियों से युगल सरकार की विहार केलि का वर्णन कर रही हैं- सारङ्ग मूल- देखि सखी राधा पिय केलि। ये दोउ खोरि खरिक गिरि गहवर, विहरत कुँवर कंठ भुज मेलि।। ये दोउ नवल किसोर रूप निधि, विटप तमाल कनक मनौ बेलि।