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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

हित चौरासी • • १६७ सामने निरन्तर उसी अनूप रूप को देखना चाहते हैं; इसके लिये उन्होंने दूतिका श्रीहित अलि से अनेकों प्रार्थनाएँ भी की हैं। दूतिका श्रीप्रियाजी के समीप आकर नुति पूर्वक प्रियतम की अभिलाषा प्रकट करती है कि—“माँगवत लाल लाड़िलौ नागर;” “क्या माँगता है ?” “आपके रूप यौवन का दान-कर ।” “क्यों ?” “क्योंकि आपने अपने पास बहुत सी सौंज सम्पत्ति एकत्र कर रखी है ।” “तो सखी ! उन्हें मेरी सम्पत्ति का परिचय भेद बताया किसने ? “आप नहीं जानतीं । स्वामिनि ! आपके ही वाचाल नूपुरों ने । शरणागत हैं न ये आपके ?” प्रियतम के सन्देश को प्रियाजी ने सुना और वे मुस्करा गयीं । अस्तु; अब आप इस वचन माधुरी का आस्वादन श्रीहित अलि के श्रीवचनों में कीजिये- सारङ्ग मूल-दान दै री नवल किसोरी। माँगवत लाल लाड़िलौ नागर, प्रगट भई दिन दिन की चोरी।।। नव नारंग कनक हीरावलि, विद्रुम सरस जलज मनि गोरी। पूरित रस पीयूष जुगल घट, कमल कदलि खंजन की जोरी।। तोपैं सकल सौंज दामिनि की, कत सतराति कुटिल दृग भोरी। नूपुर रव किंकिनी पिसुन घर, ‘हित हरिवंश’ कहत नहिं थोरी।।५१।। भावार्थ-(दूतिका ने कहा-) “हे नवल किशोरी ! लाड़िले नागर श्रीलालजी के समीप तुम्हारी दिन दिन की चोरी (-छिपाई हुई यौवन सम्पत्ति) प्रकट हो गयी है; वे अब (तुमसे तुम्हारी सम्पत्ति पर) दान-कर माँग रहे हैं अतः तुम उन्हें कर दो अवश्य । तुम्हारे पास (अनेकों प्रकार की सम्पत्ति भी तो है टैक्स देने योग्य; जैसे-) नवीन नारङ्ग कनक फल, हीरों की पंक्ति, रस मय मूँगा (विद्रुम) मणि, जलज (मुक्ता) मणि, अमृत रस से परिपूर्ण दो दो कनक कलश, युगल