हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ • • हित चौरासी कमल, युगल कदलि स्तम्भ और खञ्जनों की जोड़ी। स्वामिनि ! यह सब कुछ है भी तो तुम्हारे पास !" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं-"अरी सखी !(तू मेरी बात सुनकर) क्यों मुझ पर टेढ़ी भृकुटि और तिरछी आँखें करके सतरा रही है ? (वास्तव में) तेरे पास दामिनि की सम्पूर्ण सम्पत्ति (गौरता, तेज, चपलता, तरलता, प्रताप, प्रकाश आदि) तो है भी। अहो ! इसका ढिंढोरा पीटा है तुम्हारे ही घर बसे चुगल खोर नूपुर और किंङ्किणियों के मधुर रव ने।" टिप्पणी- (१) व्रज भाषा में 'दान' शब्द का प्रयोग कर या महसूल के अर्थ में हुआ है। उक्त पद में श्रीलालजी श्रीप्रियाजी की रूप सम्पत्ति पर कर माँग रहे हैं। श्रीकृष्ण रस राज्य के रसिक नरेश हैं, उन्होंने नूपुर रव और किङ्किणियों की झनकार से ही श्रीप्रियाजी के गुप्त यौवन धन की सूचना पा ली, अतः तत्काल दान की आज्ञा निकाल दी। दूतिका रूप सिपाही ने आज्ञा सुनाते समय अपनी भी राय दी कि ठीक तो है "तोपैं सकल सौंज दामिनि की; कत सतराति... ?" जब तुम्हारे पास सम्पत्ति है तो फिर दान माँगने पर नाराज होने की क्या आवश्यकता ? शायद तुम यह समझ रही होगी कि मैंने ही तुम्हारे यौवन धन का पता उन्हें दिया है किन्तु सरकार ! बात ऐसी है नहीं। यह पता तो दिया है आपके ही चरण सेवकों ने-इन नूपुरों ने। मैंने तो एक शब्द भी नहीं कहा। इस पद में- (२) नव नारंग कनक हीरावली, विद्रुम सरस जलज मनि गोरी। पूरित रस पीयूष जुगल घट कमल कदलि खंजन की जोरी।। .....................सकल सौंज दामिनि की................................। इन उपमाओं के द्वारा श्रीप्रियाजी के यौवन लावण्य और रूप की ओर सङ्केत किया गया है किन्तु उपमेय का नाम भी नहीं है। यह शैली अन्य शैलियों