हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १६६ से कुछ विलक्षण है। यह रसिक जनों की अनोखी एवं साङ्केतिक वाणी है। इस उक्त वचन रचना से चतुर एवं रसवती नायिका, नायक के सम्पूर्ण भावों को समझ लेती है। यही ठीक भी है कि ऐसी गोप्य शृङ्गार रस पूर्ण बातों को अधिक स्पष्ट करके कहने में उसकी शोभा नष्ट हो जाती है। पर्दे की बातें पर्दे में ही फबती हैं। महात्मा सूर दासजी ने भी इसी प्रकार श्रीप्रियाजी के रूप लावण्य का वर्णन किसी दूती सखी के द्वारा प्रियतम श्रीलाल जी के समीप कराया है। क्या ही अनूठे ढँग से सखी कह रही है। अद्भुत एक अनुपम बाग। जुगल कमल पर गज क्रीड़त है, तापर सिंह करत अनुराग।। हरि पर सर वर सर पर गिरिवर, गिरि पर फूले कंज पराग। रुचिर कपोत बसै ता ऊपर, ता ऊपर अमृत फल लाग।। फल पर पुहुप पुहुप पर पल्लव, तापर सुक पिक मृगमद काग। खंजन धनुष चंद्रमा ऊपर ता ऊपर इक मनिधर नाग।। अंग अंग प्रति और और छवि, उपमा ताकौ करत न त्याग। सूरदास प्रभु पियहु सुधा रस मानौं अधरनि के बड़ भाग।। इस पद में श्रीप्रियाजी के नख शिख रूप का वर्णन केवल उपमाओं से ही कर दिया गया है। इसी प्रकार इंक्यावनवें पद में भी 'नव नारंग से.......। दामिनी की' तक वर्णन में रूप, लावण्य यौवन का ही वर्णन है जिसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है- १. दान-यौवन सम्पत्ति पर कर या टैक्स। २. नवल किशोरी-नव यौवन सम्पन्न नवोढ़ा नायिका श्रीराधा ३. लाड़िलौ नागर-धीर ललित नायक, रसिक शेखर श्रीकृष्ण, प्रियतम। ४. प्रकट भई दिन दिन की चोरी- नायिका के नव यौवन का पूर्ण विकास हो चुका है और उसकी ख्याति भी हो चुकी है जिसका श्रवण करके नायक श्रीलालजी पूर्ण मुग्ध हैं, प्रेमातुर हैं। ५. नव नारंग- नारङ्ग फल सदृश अरुणाभ कपोल जो अंग गौरता से मिलकर पीतारुण हो रहे हैं।