हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १७१ मलार मूल–देखौ माई सुंदरता की सीवाँ। ब्रज नव तरुनि कदंब नागरी, निरखि करतिं अधग्रीवाँ।। जो कोउ कोटि कलप लगि जीवै रसना कोटिक पावै। तऊ रुचिर वदनारबिंद की सोभा कहत न आवै।। देव लोक भूलोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये। सहज माधुरी अंग अंग की कहि कासौँ पटतरिये।। (जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर। जाकी भ्रू विलास बस पसुरिव दिन विथकित रस सागर॥५२॥ भावार्थ–(श्रीहित सखी कहती हैं–) ‘हे सखियो ! सुन्दरता की सीमा (श्रीराधा) को तो देखो ! जिस नागरी को देख कर समस्त व्रज की नव युवती गण (उसकी सौन्दर्य राशि के सामने लज्जावश अपना) सिर झुका लेती हैं अर्थात् उनके रूप के सामने अपने रूप की लघुता स्वीकार करके सिर नीचा कर लेती हैं लजाकर। (उस अपार श्रीप्रिया रूप की शोभा का वर्णन करने के लिये) यदि कोई कोटि कोटि कल्पों तक जीवित रहकर कोटि कोटि जिह्वायें प्राप्त कर भी ले तो भी उस रुचि पूर्ण मुख कमल की शोभा का वर्णन वह नहीं कर सकता (उससे वह शोभा कहते ही न आवेगी।) देवलोक, भूलोक एवं रसातल के समस्त कवि कुल (समुदाय) की बुद्धि (उस रूप की महिमा का वर्णन) सुन सुन कर डरती रहती है कि हम उस अङ्ग प्रत्यङ्ग के सहज माधुर्य की उपमा दें तो दें किससे ? (अथवा श्रीहित जी कहते हैं कि जिसके वर्णन करने में समस्त कवि कुल की मति चौंधया रही है फिर मैं ही उस रूप की उपमा कैसे और किससे दूँ ?”) श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं-“श्रीश्याम सुन्दर तो प्रताप, रूप, गुण, आयु (वय) एवं बल सभी बातों में उजागर हैं–प्रगट हैं फिर भी वे रस समुद्र श्याम जिसकी भृकुटियों के इशारे के वशवर्त्ती पशु की भाँति निरन्तर लाचार से रहे आते हैं, (उस रूप की सीमा–श्रीराधा–को देखो, समझो।”