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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

हित चौरासी • • १७३ हा हरिवंश अनीति रीति हित; कत डारति तन त्रास॥५३॥ भावार्थ-(श्रीहित सजनी ने अपनी सखियों से कहा-) "हे माई ! देखो ! अबला (श्रीराधा) की बल राशि को तो देखो ! जिन श्रीराधा को देखते ही अत्यन्त मतवाले एवं निरङ्कुश गजराज वत् मोहन लाल भी उनकी केश लट के एक (अल्प) बन्धन में अपने आप (विना प्रयत्न के ही) बँध गये। जब अभी अभी-बिना प्रयास के अकस्मात् ही उनकी मनोगति पङ्गु हो गयी, तब उस समय की क्या बात कहूँ जब वे (श्रीप्रियाजी) प्रियतम की ओर भौहें नचाकर-विलास पूर्वक देखेंगी ?” "उसी समय (श्रीप्रियाजी ने अपनी कुन्तल लट को जो कपोल पर आ पड़ी थी, सम्हालने के लिये) केश सँकेलने के बहाने से अपनी बाहुलता का दर्शन कराया, और मुसकान पूर्वक अपने श्रीमुख को विकसित कर दिया; (बस इतने से श्री लालजी की दशा प्रेम विह्वल हो गई। यह सब देख श्रीहित) हरिवंश सजनी बोल उठीं-हाय ! हाय !! इस प्रीति की रीति में भी बड़ी अनीति है ! अरी ! अब क्यों (उन प्रेम विह्वल को) व्यर्थ तन त्रास दे रही हो ? (जो अपने आप घायल है उसे और भी छेदना क्या यही प्रेम राज्य की रीति है ?") टिप्पणी-इस पद में श्रीप्रियाजी के अनुपम रूप सौन्दर्य की ओर बड़ी कुशल कला से इङ्गित किया गया है। कितना अपार बल है उस अबला के पास? जिसके एक लट बन्धन में बाँधा गया वह; जो मोहन, विश्व विमोहन मोहन, अतिमत्त गजराज की तरह उन्मद रूप से छका हुआ और फिर निरङ्कुश ! स्वातन्त्र्य और रूप की चरम सीमा ! वह सीमा भी अवला के एक लट पाश में ढँक गयी ! ओह ! कैसा होगा वह रूप ? कल्पनातीत है !! मत्त गजराज निरङ्कुश मोहन का मन लट पाश में अपने आप बँधकर पङ्गु बन गया। अबला का न कोई प्रयास था न उद्यम। यदि कदाचित् अबला अपनी ओर से किसी प्रकार का प्रयास कर दे तो ? मत पूछो क्या होगा। हुआ भी वही, जिसका डर था। स्वभावतः अवला ने अपनी विलुलित अलक को समेट कर एकत्र कर देना चाहा कबरी के साथ; अतः उसने