हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ - • हित चौरासी मुसकाते हुए भुजाएँ उठाकर लट को कबरी के साथ सम्हाली जिससे सहज ही उसके वाहु मूल का दर्शन होने लगा। बस इतने से मोहन लाल की गति-मति अपने आप खो चली। यह देखकर अवला ने थोड़ा सा और मुसका दिया। मोहन मूर्च्छित हो गये। कविवर विहारी की उक्ति-"काको मन बाँधै नहीं, जूरौ बाँधनि हारि" से भी आगे बढ़ गयी यह स्थिति। यहाँ तन मन दोनों अपने आपे से दूर खो गये। महामत्त गजराज एवं निरङ्कुश मोहन की अवला के द्वारा यह दुर्दशा देखकर स्वयं हित भी तरस खा गया। प्रेम देवता को अपने आप पर दुःख हो गया। वह बोल उठा- "हा हरिवंश ! अनीति रीति हित कत डारति तन त्रास ?" "हाय ! हाय !! प्रेम की रीति में भी अन्याय है, उत्पीड़न है ?" भला- तासौँ ऐसी चाहिये, जो तन मन रह्यौ हारि ? कितना अन्धेर है ? अस्तु; जब "प्रताप, रूप, गुन, वय, वल उजागर श्याम" की यह दशा है यहाँ तब कैसे इङ्गित किया जाय उस अपार अतर्क्य, अनन्त और अवर्णनीय रूप सौन्दर्य मयी अवला की वल राशि की ओर ?
- ५४ - अवतरण-युगल किशोर का विहार नित्य है। इस विहार में युगल, सखियाँ, वृन्दावन, खग मृग सभी कुछ नित्य है और नित्य के साथ-साथ नव्य हैं। इस अनादि अनन्त विहार की रमणीयता रसिकता भी नित्य एवं नूतन है। इस नित्य नूतनता का वर्णन इस पद में गागर में सागर की शैली से-सूत्र रूप से भरा गया है। सुहावनी पावस की ऋतु आ लगी है। मधुर मधुर गर्जना करते हुए नव जलधर आ आकर आकाश को आच्छादित कर देते हैं और उनसे नयी-नयी