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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 275 में से

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पृष्ठ 181

हित चौरासी • • १७५ बूँदें भी बरसने लगती हैं। नवीन मेघों को देखकर चातक और मोर मुदित होकर कूकने लगते हैं। इधर लता-मण्डप में छिपे हुए नवल किशोर युगल की नयी चूनरी नव पीताम्बर भी नवीन बूँदों से भींजने लगते हैं; तब दोनों अपने अञ्चलों की ओट करते हैं और- ललिता ललित रूप रस भींजी बूँद वचावत पातनु। आज पावस की नयी झर में सब कुछ नया ही नया है। श्रीहिताचार्य्य चरण इसका वर्णन भी नये ही ढँग से करते हैं- मलार मूल-नयौ नेह नव रंग नयौ रस, नवल स्याम वृषभानु किसोरी। नव पीतांबर नवल चूनरी; नई नई बूँदनि भींजति गोरी॥ नव वृंदावन हरित मनोहर; नव चातक बोलत मोर मोरी। नव मुरली जु मलार नई गति; श्रवन सुनत आये घन घोरी॥ नव भूषन नव मुकुट विराजत; नई नई उरप लेत थोरी थोरी। (जै श्री) हित हरिवंश असीस देत मुख चिरजीवौ भूतल यह जोरी॥५४॥ भावार्थ-आज नवल श्याम और नवल वृषभानु किशोरी में (परस्पर) नवीन स्नेह, नवीन आनन्द एवं नया ही रस भर रहा है। यहाँ श्याम सुन्दर का नया पीत पट है तो वहाँ वृषभानु किशोरी की नयी चूनरी। (उस नवल चूनरी को पहिने हुए) गोरी नयी ही नयी बूँदों से भींग रही हैं। जैसा नया, हरा-भरा और मनोहर वृन्दावन है; वैसे ही उसमें नये ही नये चातक, मोर और मयूरियाँ बोल रही हैं ! इधर नवल श्याम सुन्दर ने अपनी नयी मुरली में नयी ही गति से नवीन प्रकार का मलार राग छेड़ दिया है, जिसे सुनकर नये नये मेघ भी घिर कर घुमड़ आये है।

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