हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ • • हित चौरासी श्रीश्याम सुन्दर के श्री अङ्गों में नये ही तो आभूषण हैं और सिर पर नया मुकुट विराज रहा है। वे नृत्य में उरप और तिरप नामक गतियां मन्द मंद ले रहे हैं। (इस नवीन सुख एवं समाज को देख कर) श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (प्रीति पूर्वक) अपने मुख से आशीष देते हैं कि यह जोड़ी भूतल (इस लोक में मथुरा मण्डलान्तर्गत प्रकट श्रीवृन्दावन धाम) में क्रीड़ा करती हुई चिरजीवी रहे। टिप्पणी- नयौ नेह नव रंग नयौ रस; नवल स्याम वृषभानु किसोरी। यह बात प्रसङ्ग वशात् कई बार कही जा चुकी है कि श्री हिताचार्य चरण ने रसमयी उपासना के द्वारा रसमय नित्य विहार को ही लक्ष्य बताया है। यह नित्य विहार नित्य नवीन है। यदि इसमें कुछ पुरानापन आजाय तो यह नीरस हो जाय किन्तु ऐसा यहाँ नहीं है, वरं यह नित्य प्रेम रस से ओत प्रोत, नित्य नूतन और प्रतिक्षण वर्द्धमान् सरस रहा आता है। यहाँ समस्त परिकर के हृदय में प्रतिक्षण प्रेम, चाह, चटपटी चौंप, विरह, प्यास (उत्कण्ठा) आदि बढ़ते ही रहते हैं। यहाँ प्रत्येक वस्तु और भाव नवीन क्यों और कैसे है; उसे देखिये- (१) नयौ नेह-नया ही प्रेम है; इसका भाव यह है कि प्रेम सदा अपूर्ण रहता है पूर्ण नहीं होता। प्रेमी भी सदा अपने को अपूर्ण ही मानता रहता है-अपने में अपूर्णता का अनुभव करता रहता है। श्रीप्रियाजी सोचती हैं कि मेरे हृदय में प्रियतम के प्रति किञ्चित् भी प्यार नहीं; वास्तव में वही मुझ पर प्यार करते हैं। ठीक इसी प्रकार श्रीलालजी अपनी प्रियतमा के लिये सोचते हैं कि वास्तव में वही मुझसे प्यार करती हैं, मेरे हृदय में तो कुछ है ही नहीं; यथा- मेरे तन मन प्रान हूँ तें प्रीतम प्रिय; अपने कोटिक प्रान प्रीतम मोसों हारे। इसलिये सदा अपने हृदय में अपूर्णता का अनुभव करते रहने पर जो प्रेम उदित होता है, वह नया ही अनुभव होता है। क्योंकि-