हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १६ सत्यं शिवं सुन्दरम् है तो उसके मूल में एक चरम सत्य का दर्शन करता हूँ। वह सत्य उज्ज्वल है, शान्तिपूर्ण है, कल्याणमय है और अमलात्मा मुनिजन वंदनीय है। तब मैं निर्भय होकर एक आनन्द का अनुभव करता हूँ अपनी इस सेवा वृत्ति के द्वारा। अस्तु; इसी अवलम्ब को लेकर इस अल्पमति ने अपने इस लघु एवं असफल से प्रयास में रसिकावतंस आचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद द्वारा प्रकाश किये गये दिव्य एव परमोज्ज्वल शृङ्गार रस को अपनी शक्ति भर उसके अपने यथार्थ रूप में ही ला रखने की कोशिश की है। उस रस-प्रवाह के विशुद्ध सम्पतन में कोई विकृति न आ जाय इस भय से मैं सदा भयभीत रहा हूँ। हित चौरासी के दिव्य पदों के भावार्थ लिखने में केवल शब्दों के पर्याय वाची दूसरे शब्द लिखने का ही मेरा आग्रह रहा है। कहीं कहीं तो ब्रज भाषा के प्राचीन शब्दों को वर्त्तमान खड़ी बोली का रूप देकर पंक्ति के शेष शब्द ज्यों के त्यों रख दिये गये हैं। ऐसा करने में पद के मूल भाव की रक्षा ही लक्ष्य में रही है। इस बात की और भी रक्षा करने के लिये मैंने भावार्थ के साथ अपना मत जो भी कुछ लिखा है उसे [ .... ] इस कोष्ठ में रख दिया है और जहाँ कहीं मूल के शब्द या पंक्ति के अर्थ लिखने की आवश्यकता पड़ी है, वहाँ (....) इस लघु कोष्ठ का प्रयोग किया है। कहीं कहीं किसी शब्द, वाक्य या क्रिया के भाव को अधिक स्पष्ट करने के लिए - शब्द, वाक्य, क्रिया - इस शैली का प्रयोग किया गया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में प्रत्येक पद के पूर्व, 'अवतरण' नाम से पद के भीतर आये हुए भावों की परिचय रूपा भूमिका सी है। यह 'अवतरण'-या पद परिचय मेरी अपनी भावना का है। इन अवतरणों में पद के लिये जो भूमि निर्माण की गयी है, वह एक दम ठीक ही है, मैं ऐसा दम भरने का दुस्साहस नहीं कर सकता। इन अवतरणों को प्रत्येक व्यक्ति रस विलास सिद्धान्त का ध्यान रखते हुए अपने भावानुसार अलग-अलग भी निर्मित कर सकता है। दूसरी बात पदों के मूल पाठ की है। इस ग्रन्थ में प्राचीन से प्राचीन प्रतियाँ जो मुझे मिल सकी हैं, उन्हीं से यहाँ पाठ लिया गया है। वर्त्तमान् प्रकाशित प्रतियों में और निकट भूतकाल में लिखित प्रतियों में मूल प्रायः अशुद्ध है; क्योंकि ब्रज-भाषा के विचार से शब्दों का जो रूप होना चाहिये