भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

२० • • हित चौरासी

इनमें वह न होकर शुद्ध संस्कृत के अनुसार है। यह बात ब्रजभाषा के सारल्य स्वाद और लावण्य को न्यून सी करती है, अतः मुझे ही क्यों सब भाषा मर्मज्ञों को अनुचित ही प्रतीत होगी। ब्रजभाषा के रूप इन प्रतियों में शुद्ध होकर संस्कृत किंवा हिंदी में किस प्रकार हुए कुछ इसके उदाहरण देखिये-

ब्रजभाषावर्तमान हिन्दी
भाँमतीभावती
प्राँनप्राण
जाँमिनीयामिनी
रमनरमण
जुद्धयुद्ध
सैनशयन
अंकअङ्क
राइराय
सुरस्वर
मंजुलमञ्जुल

– इत्यादि यद्यपि यह शब्द रूपान्तर अर्थ रूवान्तर नहीं करता, तथापि ब्रज-वाणी की रसात्मक धारा एवं लालित्य में अवश्य एक कण्टक है, जिसे मनीषी गण समझ सकते हैं। मूल पाठ में आये हुए कुछ पारिभाषिक शब्दों के अर्थ प्रसंग में जैसे घटित हो रहे हैं उसी तरह लिखे गये हैं, इससे साहित्यिक सज्जनों को विचार तो अवश्य होगा किन्तु इन शब्दार्थों से पद का भाव समझने में पर्याप्त सहायता मिलेगी और वह सहायता उसी दिशा में होगी जो रसिकाचार्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र की रस विहार की किंवा 'हित चौरासी' की दिशा है। पहले इन पारिभाषिक शब्दों पर स्वतन्त्र टिप्पणियाँ लिख दूँ ऐसा मन हुआ किन्तु ग्रन्थ का कलेवर बढ़ जाने एवं रस विहार का अत्यन्त स्पष्टीकरण हो जाने के भय से मैने ऐसा नहीं किया।