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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

हित चौरासी • • २१ इस नित्य विहार रस पूर्ण ग्रन्थ के प्रणेता हैं – रसिकाचार्य्य वर्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में कुल चौरासी ही पद हैं, शायद इसी से हित चौरासी नाम दिया गया है। ग्रन्थ के सम्पूर्ण पद मुक्तक हैं। प्रत्येक पद अपने लिये स्वतंत्र है, वह दूसरे पद की अपेक्षा नहीं रखता, तथापि सम्पूर्ण ग्रन्थ में आद्यन्त केवल एक ही विषय, परमोज्वल शृंगार-विशुद्ध वृन्दावन रस विलास वर्णित है; यह वर्णन कितना जागृत वर्णन है, कहने की आवश्यकता नहीं। संस्कृत साहित्य में जिस प्रकार श्रीजयदेव कविराज का गीत गोविन्द महाकाव्य शृङ्गार रस वर्णन के सर्वोच्च सिंहासन पर आसीन है, उसी प्रकार ब्रज भाषा साहित्य में हित चौरासी का स्थान है। काव्य के गुण, अर्थ, अनुप्रास, उक्ति चोज, अलङ्कार, भाव व्यञ्जना, प्रसाद, शब्द माधुर्य्य, अर्थ माधुर्य्य मौलिकता आदि गुणों में यह ग्रन्थ अपने समान आप ही है। वर्तमान् युग के साहित्य महारथी श्रीवियोगी हरि जी “ब्रज माधुरी सार में लिखते हैं- “भाषा में हित चौरासी एक अनुपम ग्रन्थ है। पढ़ते-पढ़ते कहीं-कहीं तो कवि कोकिल जयदेव का स्मरण हो आता है। श्री गोसाईं जी ने ब्रज साहित्य का भारी उपकार किया है। श्रीहितजी ने आध्यात्मिक पक्ष के अर्थानुसार श्रीराधाकृष्ण का विशुद्ध शृङ्गार वर्णन किया है। इनका वर्णित रास विहार प्रकृति पुरुष का एक दिव्य रहस्य कहा जाता है....।” अस्तु, उपासना और भक्ति के क्षेत्र में श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु भगवान् श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार माने जाते हैं। यह वंशी साक्षात् प्रेम रूपा है अतः यह बात निर्विवाद सिद्ध हो जाती है कि श्रीहित जी युगल किशोर श्रीराधा वल्लभ लाल के पारस्परिक प्रेम के ही दिव्य अवतार हैं। इनकी इष्टाराध्या हैं नित्य रास रस विहारिणी, वृन्दावन निभृत निकुञ्ज विलासिनी, नित्य नव किशोरी प्रेम प्रतिमा श्रीराधा। अतः श्रीहित हरिवंश चन्द्र ने सर्वत्र ही अपने पद एव श्लोकों में रस मूर्त्ति श्रीराधा के रूप, गुण, लीला, प्रभाव एवं स्वविलास आदि का ही गान किया है, क्योंकि श्रीकृष्ण की वंशी भी तो यही सब कुछ करती है। वंशी स्वरूप श्रीहिताचार्य्य की वाणी रसिक अनन्यों का जीवन है, वे इस वाणी रस गान का पान करके उन्मत की भाँति गा उठते हैं-