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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 275 में से

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२२ • • हित चौरासी रास रस रचित बानीं जु प्रगटित जगत, सुद्ध अविरुद्ध परसिद्ध जानी। स्याम स्यामा प्रगट प्रगट अक्षर निकट, प्रगट रस श्रवत अति मधुर बानी।। सो जु बानीं रसिक नित्य निसिदिन रटत, कहत अरु सुनत रस रीति जानी। ताहि तजि और गाऊँ न कबहुँ कछू, प्रान रमि रही (श्री) हरिवंश बानीं।। –सेवकजी अस्तुः श्रीहितजी की रसोपासना का साधन भी विशुद्ध प्रेम ही है। इस प्रेम के लक्ष्य और स्वरूप हैं श्रीवन विहारी श्रीराधा और श्रीकृष्ण। इस तत्व की उपासना करने वाले उपासक 'रसिक अनन्य' कहे जाते हैं। इन रसिक अनन्यों का लक्ष्य मोक्षादि न होकर रस स्वरूप नित्य विहार की प्राप्ति है। नित्य विहार में उनका स्वरूप दिव्य नव किशोरी है। इनका भाव दासी है और सुख–तत्सुख है। हित चौरासी में इसी तत्सुख पूर्ण दासी भाव की रस धारा है। पाठकों को इसका विशद वर्णन 'प्राक्कथन' में मिलेगा। अन्त में इतना ही कहना अलं होगा कि यदि मेरे इस प्रयास से किसी भी सहृदय को कुछ लाभ मिल सका तो मेरा सम्पूर्ण श्रम सफल है– मैं धन्य हूँ। वृन्दावन – विनयावनत कुंजगली हितदास गुरु पूर्णिमा २००७ वि०

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