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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 275 में से

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पृष्ठ 28

॥ श्रीहित राधावल्लभ ॥ प्राक्कथन 'रस' एक ऐसा विलक्षण तत्व है जो एक होकर भी अनेक रूपों में प्रतिभासित होता रहता है। इसी लिये रस को ब्रह्म कहा गया है- रसो वै सः; (श्रुति...)। भोजन के छः और साहित्य के नव (नौ) रस तो प्रसिद्ध ही हैं किन्तु इनके सिवाय रस के और भी भेद प्रभेद हो सकते हैं। इसी विचार से श्रीरूप गोस्वामी ने भक्ति को एक रस स्वीकार किया है जो साहित्य के नौ रसों से परे है। महाप्रभु श्री हित हरिवंश चन्द्र कृत 'हित चौरासी' में जिस रस का गान किया गया है वह भक्ति रस से अत्यन्त परे है। जिसके लिये श्रीहरिराम जी 'व्यास' ने कहा है- नवधा लौं सब भक्ति उबीठी रति भागौत कथा की। रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभा की॥ नवधा में अन्तिम आत्म निवेदन और श्रीमद् भागवत कथित रति-गोपी प्रेम से भी श्रेष्ठ है रसिक अनन्यों की रहनी एवं करनी। जिस रस को धारण करके उपासक 'रसिक अनन्य' कहलाते हैं; वह है वृन्दावन रस। यह वृन्दावन रस सबसे विलक्षण है। इसके समक्ष धर्म अर्थ, काम, मोक्ष, योग ध्यान, धारणा, ज्ञान कर्म सब निस्तेज हो जाते हैं। इस 'वृन्दावन-रस' का स्वरूप क्या है ? इसके प्राकट्य-कर्त्ता आचार्य्य कौन हैं ? इत्यादि प्रश्न पाठकों के लिये आवश्यकीय हैं; अतः इस विषय में प्रथम हम रसिकाचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद का संक्षिप्त जीवन परिचय देकर फिर उनके द्वारा प्रकाशित 'श्रीवृन्दावन रस' की चर्चा करेंगे- रसिकाचार्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र का परिचय - "श्रीराधा चरण प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद का यथार्थ परिचय तो भक्तमाल कार श्रीनाभा स्वामी के इस छप्पय से मिलता है-

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