हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ • • हित चौरासी नहीं समस्त जड़ चेतनमय जगत को संप्लावित कर देती हैं। आपकी चारु मूर्त्ति अनन्त विद्युल्लताओं जैसी पीतारुण और प्रौढ़ अनुराग मद से पूर्ण विह्वल रही आती है। नव यौवन के नित्य विकास में युगल कनक कलशों का सोल्लास विलास ? मानों सघनतम अनुराग सार सरोवर का कमल मुख चन्द्र की कौमुदी प्राप्त करके फिर अपनी छाती चीर कर दो हो गया है। आपके युगल कुच कलश, क्रीड़ा सरोवर के दो कमल कुडमल हैं अथवा स्वानन्द पूर्ण रस कल्पतरु के दो फल जो भुवन मोहन को भी मोहित करते रहते हैं। कितना लावण्य है राधा सुन्दरी के नेत्र संचलन में कि जिनके कटाक्ष शर-पात से श्याम सुन्दर का वेणु हाथ से गिर पड़ता, पीताम्बर श्री अङ्गों से खिसक पड़ता, सिर से मयूर-पिच्छ स्खलित हो जाता और वे अन्ततः मूर्च्छित होकर गिर भी पड़ते हैं। ये हैं तो अबला (किन्तु इनकी बल-राशि का कोई माप है?) सौन्दर्य बल राशि का चमत्कार तो देखिये- देखौ माई ! अबला के बल-रासि। अति गज मत्त निरंकुस मोहन निरखि बँधे लट पासि।। अबही पंगु भई मन की गति बिनु उद्दिम अनियास। तब की कहा कहौं जब पिय प्रति चाहति भृकुटिविलास।। कच संजमनि व्याज भुज दरसति मुसकनि बदन विकास। हा हरिवंश ! अनीति रीत हित कत डारति तन त्रास।। -हित चौरासी, पद सं० ५३, नित्य नव कैशोर से उल्लसित श्रीराधा समस्त व्रज सुंदरियों की चूड़ामणि हैं। अपने श्रीमुख की ज्योत्सना से आप मानो शरत् कालीन अनन्त चन्द्रमाओं का प्रकाश विस्तार करती रहती हैं। श्रीराधा ने अपनी चञ्चल भ्रूभङ्गी के लेश मात्र से ही व्रज मणि श्रीकृष्ण को अपना वशवर्त्ती कर रखा है। श्रीहिताचार्य पाद कहते हैं- देखौ माई सुंदरता की सीवाँ। ब्रज नव तरुनि कदंब नागरीं निरखि करतिं अध ग्रीवाँ।। जो कोउ कोटि कलप लगि जीवै रसना कोटिक पावै। तऊ रुचिर वदनारविंद की सोभा कहत न आवै।।