हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ३१ ऐश्वर्य की दृष्टि से श्रीराधा श्रुतिशेखर लता श्रुति अलक्षित, ब्रह्मा शंकर नारदादि से अगम्य, श्रीकृष्ण वन्दिता हैं। माधुर्य्य दृष्टि से प्रेम रस की अधिष्ठात्री, श्रीकृष्ण को भी अपने रस दान से रसिक बनाने वाली और सौन्दर्य्य माधुर्य्य, लावण्य, कारुण्य सुख, छबि, रूप, वैदग्ध्य एवं रति केलि विलास की सार रूपा हैं। जिनका वसनाञ्चल वयार स्पर्श प्राप्त करके योगीन्द्र दुर्गम गति मधुसूदन भी कृतकृत्यता का अनुभव करते हैं। इनकी चरण रज में श्रीकृष्ण को भी वश में करने की विलक्षण शक्ति है। वैसे तो ये ब्रह्मेश्वरादि दुर्गम हैं तथापि कृपा परवश वृषभानु भवन में प्रकट भी हो जाती हैं तब इनकी चरण रज को गोपियाँ भी धारण करके अपने मनोभिलषित पदार्थ—रसिक शेखर श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकती हैं। ये राधा कन्दर्प कोटि शर मूर्च्छित नन्द नन्दन की जीवन दात्री संजीवनी हैं। अनन्त भाव भङ्गिमाओं की निधान एवं पूर्णानुराग सागर सार मूर्त्ति होने से इनके अङ्ग अङ्ग से रस के अमित समुद्र लहरियाँ लेते रहते हैं और लता निकुंज में विराजित कृपा रस पुंज की वृष्टि करती रहती हैं। कोक कलाओं में अतिशय प्रवीण होने से सदा ही सुरत रङ्गिणि बनी रहती हैं प्रियतम उदधि से सङ्गम करने की लालसा नित्य धावमान हैं इनमें। इन निकुंज अधीश्वरि के चरणों को हृदय में धारण करके श्रीकृष्ण अपने तीव्र स्मर ताप को शान्त करते हैं। यही चरण अपने आश्रित वर्ग के लिये सदा उज्ज्वलतम प्रेम का प्रवाह प्रवाहित करते रहते हैं, अतएव श्रीराधा आश्रितों की चिन्तामणि ब्रज नागरियों की चूडामणि, वृषभानु वंश की कुल मणि, सकामी श्याम की शान्ति मणि और हित हरिवंश की हृदय मणि हैं। अखिल सौन्दर्य्य राशि श्रीराधा जब अपने प्रियतम से बातों के रंग में ढलती हैं तो अरुण होठों से सौन्दर्य्य की अपार राशि निकल निकल कर चारों ओर फैल जाती है। ताम्बूल रंजित दंतावली, सिन्दूर अलंकृत मौक्तिक पंक्ति की शोभा को भी तिरस्कृत करने लगती है। जिनके संलाप में अनन्त अनंग तरंग मालाएँ क्षुभित हो उठतीं और अक्षर प्रत्यक्षर में अपार रस का समुद्र प्रसवित होने लगता है। ये अपनी माधुर्य्य स्निग्ध वाणी से निकुञ्ज भवन ही