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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

३० • • हित चौरासी और इसीलिये आपने समस्त आर्ष पौरुषेय ग्रन्थों एवं समस्त आचार्यों के मतों का खण्डन सा करते हुए श्रीराधा के प्रकृष्ट रूप का वर्णन किया है। देखिये- श्रीराधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्य सद्वैभवे स्वस्तोत्र स्वकृपात एव सहजोयोग्योप्यहं कारितः। पद्येनैव सदापराधिनि महन्मार्ग विरुद्ध्यत्वदे- काशेस्नेह जलाकुलाक्षि किमपि प्रीतिं प्रसादी कुरु।। –श्रीराधा सुधा निधि श्लोक २६९ अर्थात् "श्रीराधे ! आपका वैभव श्रुतियों, बुध जनों एवं स्वयं भगवान् के लिये भी अन्वेषणीय है किन्तु फिर भी आपकी कृपा के द्वारा आपका स्तोत्र पद्य रूप करने के लिये मैं सहज योग्य बना दिया गया अतएव हे स्नेह जल पूर्ण आकुल नयनि! सदापराधी एवं महत् मार्गों का भी विरोध करके एक मात्र तुम्हारी ही आशा रखने वाले मुझ पर अपनी अनिर्वचनीय कृपा प्रीति का प्रसाद कीजिये।" जिन शास्त्रों, श्रुतियों एवं आचार्यों द्वारा राधा का यह प्रकृष्ट रूप न देखा जाने से सामान्य किंवा लघु रूप से वर्णित कर दिया गया, उसके लिये आपने आश्चर्य एवं पश्चाताप भी प्रकट किया- यत्पादाम्बुरुहैक रेणु कणिकां मूर्ध्ना निधातुं न हि प्रापुर्ब्रह्म शिवादयोप्यधिकृतिं गोप्यैक भावाश्रयाः। सापि प्रेम सुधा रसाम्बुधि निधी राधापि साधारणी- भूता काल गति क्रमेण बलिना हे दैव तुभ्यं नमः।। श्रीराधासुधा निधि श्लोक ७२ अर्थात् "ओ दैव ! तुझे नमस्कार है। धन्य है तेरी महिमा !! जिससे प्रेरित होकर काल क्रम के प्रभाव वश प्रेमामृत-रस-समुद्र श्रीकृष्ण की भी निधि श्रीराधिका साधारण हो गयीं ! अहो ! जो गोपियों के भावों की एकमात्र आश्रय हैं, जिनके चरण-कमलों की रेणु के कण मात्र को ब्रह्मा शिव आदि भी अपने सिर पर धारण करने की इच्छा रखते हुए भी प्राप्त नहीं कर पाते।"

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