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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

३४ • • हित चौरासी यह वे राधा हैं, जिनके नाम का एक बार भी उच्चारण कर लेने पर सबका आकर्षण करने वाले श्रीकृष्ण भी राधा नाम जापक के पास अपने आप आकर्षित हुए चले आते हैं। तब फिर उस साधक को समस्त पुरुषार्थों में तुच्छता का स्फुरण होने लगता है। श्रीकृष्ण स्वयं भी इस नाम का जप करते हैं, सखि जनों के मुख से इस राधा नाम का गान सुना करते हैं, वे कभी कालिन्दी के तट पर बैठ कर योगीन्द्रों की भाँति इसका ध्यान करते और प्रेमाश्रु पूर्ण हो जाया करते हैं तो कभी अति रसानन्द के कारण आनन्द मग्न हो जाया करते हैं। यह राधा नाम देवताओं भक्तों, मुक्तों और श्रीकृष्ण सुहृदों से भी अत्यन्त दूर है। इस राधा नाम की महिमा अनिर्वचनीय है। इस नाम के प्रताप से राधा नाम का गान-स्मरण करने वाले को प्रियतम श्रीकृष्ण अदेय वस्तु देकर भी उसके ऋणी हो जाया करते हैं और उसके अनन्त एवं लेखा न कर सकने लायक अपराधों को तत्काल ही क्षमा करके उसे अपना बना लेते हैं। श्रीहिताचार्य पाद कहते हैं- अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति र्महाप्रेमाविष्टस्तव परम देयं विमृशति। तवैकं श्रीराधे गृणत इह नामामृत रसं महिम्नः कः सीमां स्पृशति तव दास्यैक मनसाम्।। श्रीराधा सुधा निधि श्लो. १५४ अस्तु; श्रीराधा एक अद्भुत रस तत्व है। जो लावण्य की परम अद्भुतता से परिपूर्ण है, जिसमें लीला गति दृग्भङ्गी, हास आदि की अद्भुतता विराजमान है। जब अद्भुत प्रणय-कोप से आकुल होती हैं तब महा रसिक-मौलि श्रीलालजी सभय कौतुक दृष्टि से देखते ही रह जाते हैं। आपका सौन्दर्य्य भी अत्यद्भुत है। श्रीमुख के अनुपम रसानन्द कन्द चन्द्र की चन्द्रिका के कला-अणु मात्र से ही पूर्णिमा का चन्द्र तुच्छ हो जाता है। अरे ! एक चन्द्र की तो बात ही क्या ? यदि अनेक अनेक राकाशशि एक साथ उदित होकर अपनी प्रेमामृतमयी ज्योति तरङ्गों से अगणित कोटि ब्रह्माण्डों को आपूरित कर दें, तो शायद इन विचित्र चन्द्र समूहों की श्रीराधा मुखचन्द्र की एक किरण से उपमा दी जा सकेगी।