हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ४५ इसी प्रकार और भी- कृष्णः पक्षो नव कुवलयं कृष्ण सारस्तमालो, नीलाम्भोदस्तव रुचि पदं नाम रूपैश्च कृष्णा। कृष्णे कस्मात्तव विमुखता मोहन श्याम मूर्त्ता, वित्युक्ता त्वां प्रहसित मुखी किन्तु पश्यामि राधे।। -श्रीराधा सुधा निधि:८८ श्लो० अर्थात् "हे श्रीराधे ! कृष्ण पक्ष काल अथवा श्रीकृष्ण के पक्ष वाले नवीन नील-कमल, कृष्ण सार मृग, श्याम-तमाल, नील सजल मेघ, एवं कृष्णा नाम रूप वाली कृष्णा (यमुना) ये सब के सब आपको प्रिय हैं। फिर क्या कारण है कि आपने श्याम मूर्त्ति मन मोहन से ही विमुखता प्रतिकूलता धारण कर रखी है ?" "स्वामिनि ! इस प्रकार कहने के पश्चात् क्या मैं आपको प्रहसित-मुखी (विगत-माना) न देख सकूँगी।" जब प्रियाजी अपने मान का परित्याग करके प्रियतम सङ्गम के लिये चलने को तैयार होती हैं तो ये अपने हाथों उनका समस्त शृङ्गार करती हैं। अहा ! कितना सुन्दर शृङ्गार है ! कपोल स्थलों पर ललित पत्रावली, कमल दलवत् नयनों में काजल, विम्बाफल सदृश अधरोष्ठों में ताम्बूल रङ्ग एवं युगल-उरोजों में केशर का अनुलेपन ! अहा ! पद की ललित अंगुलियों में सुरङ्ग लाक्षारस ! कैसी अद्भुत शोभा है- पत्रालीं ललितां कपोल फलके नेत्राम्बुजे कज्जलं रंग विम्ब फलाधरे च कुचयोः काश्मीरजा लेपनम्। श्रीराधे नव सङ्गमाय तरले ! पादाङ्गुली पंक्तिषु न्यस्यन्ती प्रणयादलक्तक रसं पूर्णाः कदा स्यामहम्।। -श्रीराधा सुधा निधि २२२ इत्यादि उपरोक्त वर्णनों से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीहित हरिवंश चन्द्र के सखी भाव में स्वसुख, स्वकीयत्व, परकीयत्व आदि कुछ भी न होकर तत्सुख, रति पूर्ण सखी-दासी भाव है। इस दासी-भाव का लक्ष्य है कैतव-रहित होकर राधा-चरण सेवन। इनकी इस निष्कैतव प्रीति से रीझ कर प्रियतम उन्हें