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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • ४७ के साक्षी प्रकट उज्वल रस पूर्ण अद्भुत एवं पवित्र श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए नेत्र-पिण्डों में स्थित तेजोमय निकुञ्ज की भावना करती हुई उसी के अनुसार अपने उपयोगी कोमल वपु का अवलोकन करूँ। अपने इस दिव्य स्वरूप में स्थित होकर रसिक अनन्य उपासक भावना में ही अपनी स्वामिनीजी की सेवा परिचर्या में रत होता है। इस परिचर्या का वही स्वरूप है जो सिद्ध सखियाँ ललितादि करती रहती हैं इस परिचर्या का वर्णन ऊपर आ चुका है, अतएव यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीं है। अस्तु; जिस प्रकार नित्य विहार भोग, मोक्ष, वैकुण्ठ, द्वारका, मथुरा, साकेत, व्रजभूमि और व्रज वृन्दावन से परे नित्य वृन्दावन में सम्पन्न है उसी प्रकार इस नित्य विहार के उपासक रसिक अनन्य गण भी योगी, कर्मकाण्डी, ध्यानी, ज्ञानी भक्त एवं मुक्तों से भी परे हैं इनका स्वरूप सर्वाश्चर्यमय है। रसिकाचार्य्य इनके स्वरूप का निदर्शन करते हैं- रसिक कहते हैं-"धर्म अर्थ, काम और मोक्ष ये उत्तम चार फल यदि विश्व में उत्कृष्टता को प्राप्त हैं तो भले ही रहें हमें इनकी व्यर्थ चर्चा से क्या ? और ईश्वर की उस एकान्त भक्तियोग पदवी को भी हम मौलि-मण्डन मानते हैं किन्तु उससे भी हमें क्या लेना-देना है ? हमारे चित्त को तो वृन्दावन की सीमा में विराजमान आश्चर्य रूपा किसी किशोरी मणि के कैङ्कर्य्य-रसामृत के अतिरिक्त और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।" धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतां किं तद्वृथावार्त्तया, सैकान्तेश्वर भक्ति योग पदवी त्वारोपिता मूर्द्धनि। यो वृन्दावन सीम्नि कश्चन घनाश्चर्य्यः किशोरी मणि- स्तत्कैङ्कर्य्य रसामृतादिह परं चित्ते न मे रोचते।। -श्रीराधा सुधा निधि ७७ गुरुतम भजन रूप पराक्रम युक्त कोई महा बुद्धिमान् पुरुष गण इस पृथ्वी पर विरले ही हैं जो राधिका पद रस मत्त स्थिति वश न तो अपने बाहुमूल में कभी शङ्ख चक्रादि वैष्णव चिह्न धारण करते और न कभी ललाट-पटल पर विचित्र हरिमंदिर (तिलक) ही रचते हैं। उनके सुहावने कण्ठ भाग में तुलसी की