हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ • • हित चौरासी सुहावनी माला भी धारण नहीं रह पाती। अर्थात् ये सभी वाह्य लक्षण ज्ञान से शून्य हुए अन्तरङ्ग भावना में लीन हैं। ऐसे गूढ़ाश्चर्य रूप उज्ज्वल रसाश्रित रसिक गण वेदोक्त कर्मकाण्ड का अनुष्ठान करें या न करें, माला चन्दन आदि विषय समूहों का भोग करें या न करें; इससे उनको न कोई हानि है और न लाभ ही। अहो ! राधाकान्त के भाव में पारङ्गत मति ऐसे रसिक क्या कभी अल्पज्ञ बहिर्मुख अथवा अन्य सकाम पुरुषों में से किसी के साथ मिल भी सकते हैं ? जिनके लिये विषय चर्चा कोटि-कोटि नरक जैसी वीभत्स, श्रुति कथा व्यर्थश्रम, मोक्ष भयप्रद और परेश भजनोन्मद शुकादि उपेक्षणीय है। जो केवल श्रीराधिका पद रस में निमग्न हैं। कैसी राधिका? किशोरावस्था के अद्भुत माधुरी प्रवाह से जिनकी अङ्ग-प्रत्यङ्ग छबि सर्वाग्रगण्य हो रही है जो प्रेमोल्लास प्रवाह के कारण सर्व श्रेष्ठता को प्राप्त हैं-ऐसी राधिका का जो महा पुरुष तद्गत चित्त से निरन्तर ध्यान करते हैं; उन्होंने कर्मों को नहीं छोड़ा वरं कर्मों ने ही उन्हें छोड़ दिया है और वे परम श्रेष्ठ भगवद्धर्म की ममता से भी मुक्त होकर सर्वाश्चर्य पूर्ण रसमयी परम गति को प्राप्त हो चुके हैं। ऐसे महानतम् पुरुषों के लिये बारम्बार नमस्कार है।⁹ इन रसिकों की परम उपरामता की झाँकी कीजिये- रहो दास्यं तस्या; किमपि वृषभानोर्व्रजवरी- यसः पुत्र्याः पूर्ण प्रणय रस मूर्त्तेर्यदि लभे। तदा नः किं धर्मैः किमु सुर गणैः किं च विधिना किमीशेन श्याम प्रिय मिलन यत्नैरपि च किम्।। -श्रीराधा सुधा निधि ११५ अर्थात् "यदि व्रज वरीयान् वृषभानुराय की पूर्ण प्रेम रस मूर्त्ति पुत्री का हमें एकान्त दास्य लाभ हो जाय तो फिर हमें धर्म से, देवता गणों से, ब्रह्मा और शङ्कर से, अरे ! श्याम सुन्दर के प्रिय मिलन यत्न से भी क्या प्रयोजन है ?" इसी प्रकार उपरामता के साथ निष्ठा का भी दर्शन करें- किं वा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ तदुदितैर्वर्त्मभिः सद्गृहीतै- र्यत्रास्ति प्रेम मूर्त्तेर्नहि महिम सुधा नापि भावस्त दीयः।