भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

हित चौरासी • • ४६ किंवा वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र मे नास्ति राधा, किन्त्वाशाप्यस्तु वृन्दावन भुवि मधुरा कोटि जन्मान्तरेऽपि ।। -श्रीराधा सुधा निधि, २१६ अर्थात् "जिनमें प्रेम मूर्त्ति श्रीराधा की महिमा सुधा किंवा उनके भाव का वर्णन नहीं है उन शास्त्र समूहों से अथवा उन शास्त्र विहित साधुजन गृहीत मार्ग समूहों से भी हमको क्या प्रयोजन है ! अहा ! जहाँ हमारी श्रीराधा नहीं हैं उस वैकुण्ठ शोभा श्री से भी हमको क्या ? किन्तु कोटि जन्मान्तरों में भी वृन्दावन भूमि के प्रति हमारी मधुर आशा बनी रहे, यही वाञ्छा है।" अस्तु; इस प्रकार श्रीहिताचार्य्य के सिद्धान्तानुसार सखियों एवं रसिक अनन्यों का स्वरूप भाव सब उपासकों से विलक्षण दृष्टिगत होता है। उक्त कथित "श्रीहरिवंश के इष्ट तत्व' और "उपासना भाव" सखी के योग से जिस विहार की सिद्धि सम्पन्नता होती है उसकी ओर इङ्गित किया जाता है। ३-नित्य विहार का स्वरूप- श्रुति, पुराण एवं इतिहासादि में श्रीकृष्ण की जिन शृङ्गार-लीलाओं का वर्णन है, वह श्रीहिताचार्य्य पाद का नित्य विहार न होकर ब्रज विहार है या और कुछ है, क्योंकि जैसे उनकी आराध्या श्रुति अगोचर हैं उसी प्रकार उनसे सम्पन्न होने वाला विहार अपने आप श्रुति -अगोचर सिद्ध हो जाता है। आचार्य्य पाद अवतार तत्व कृत विहार को काल-सापेक्ष मानते हैं नित्य नहीं। वे नित्य विहार एवं ब्रज विहार का अन्तर एक पद में बड़ी कुशलता से दिखाते हैं- रहौ कोऊ काहू मनहिं दियैं। मेरे प्राननाथ श्रीस्यामा सपथ करौं तिन छियैं॥ जे अवतार कदंब भजत हैं धरि दृढ़ व्रत जु हियैं। तेऊ उमगि तजत मर्जादा बन विहार रस पियैं॥ खोयें रतन फिरत जे घर घर कौन काज ऐसें जियैं। (जै श्री) हित हरिवंश अनत सचु नाहीं बिनु या रजहिं लियैं।।

  • स्फुट वाणी पद, २०