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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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५० • • हित चौरासी आप अपने उपास्य इस नित्य विहार को इसी भूतल स्थित वृन्दावन में संतत है ऐसा मानते हैं- जै श्री हित हरिवंश विपिन भूतल पर संतत अविचल जोरी। –हित चौरासी पद ७० और (जै श्री) हित हरिवंश करौ दिन दोऊ अचल विहार। –हित चौरासी पद ५७ यह नित्य विहार, गोपी एवं गोपीकान्त के स्वकीया परकीया, मिलन एवं विरह से परे स्व पर भेद रहित शुद्ध प्रेम रति है। श्रीहित महाप्रभु के मत से स्वकीया, परकीया और मिलन एवं विरह प्रत्येक अलग-अलग अपनी अपनी जगह में अपूर्ण हैं। स्वकीया में मिलन है किन्तु विरह जन्य प्रेम वेदना नहीं। परकीया में विरह है किन्तु नित्य मिलन की सुखानुभूति नहीं। इसे आपने चकई और सारस के वार्त्तालाप के प्रसङ्ग से इस प्रकार समझाया है- चकई प्रान जु घट रहें पिय विछुरंत निकज्ज। सर अंतर अरु काल निसि तरफ तेज घन गज्ज।। तरफ तेज घन गज्ज लज्ज तुहि वदन न आवै। जल विहून करि नैन भोर किहिं भाइ बतावै।। (जै श्री) हित हरिवंश विचारि बाद अस कौन जु बकई। सारस यह संदेह प्रान घट रहें जु चकई।। – स्फुट वाणी पद ५; भाव यह कि सारस के विचार से चकई का विरह जन्य प्रेम अपूर्ण है जो विरह में भी प्रियतम के बिना जीवित रह पाती है किन्तु सारस के विरहानुभूति रहित प्रेम को चकई तुच्छ मानती है; देखिये- सारस सर विछुरंत कौ जो पलु सहै सरीर। अगिन अनंग जु तिय भखै तौ जानै पर पीर।। तौ जानै पर पीर धीर धरि सकहि वज्र तन। मरत सारसहिं फूट पुनि न पर्यौ जु लहत मन।। अन्त में आचार्यपाद अपना मत देते हैं कि प्रेम विरह के बिना सभी प्रकार के प्रेम चाहे वह मिलन में हों या विरह में, विडम्बना ही हैं।