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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • ५१ जै श्री हित हरिवंश विचारि प्रेम विरहा विनु वा रस। निकट कंत नित रहत मरम कहा जानै सारस॥ –स्फुट वाणी पद ६ प्रश्न हो सकता है कि यह ‘प्रेम विरहा’ क्या है ? इसका संक्षिप्त उत्तर इतना ही है कि जहाँ नित्य–मिलन में तीव्र प्रेमोत्कण्ठा के रूप में विरह है वह सूक्ष्म प्रेम–गति ही ‘प्रेम–विरहा’ है। यह प्रेम विरहा नित्य विहार रस का प्राण है। प्रेम विरह का स्वरूपाङ्कन करते हुए आचार्य्यपाद ने लिखा है– कहा कहौं इन नैननिं की बात। ये अलि प्रिया वदन अंबुज रस अटके अनत न जात॥ जब जब रुकत पलक संपुट लट अति आतुर अकुलात। लंपट लव निमेष अंतर ते अलप कलप सत सात॥ श्रुति पर कंज, दृगंजन, कुच विच मृग मद ह्वै न समात। जै श्री हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात॥ –हित चौरासी, पद ६० इस प्रकार युगल किशोर के नित्य मिलन में स्थूल विरह की कल्पना तो नहीं है किन्तु मिलन में भी प्रेम की क्षीणता न होकर नित्य नूतन स्वाद, चाह चटपटी रूप सूक्ष्म विरह पूर्ण रूप से है। प्रेमासव पूर्ण रूप माधुरी का पान करके दोनों किशोर किशोरी नित्य अतृप्त–विरही हैं– देखत आप में रूप न कबहुँ समात हैं। दोउ इक रस रीति न प्रेम समात हैं॥ पलु पलु में रुचि बढ़ै सखी मुसिकात हैं। मुख सौं मुख रहे जोरि तऊ ललचात हैं॥ – रहस्य लता इस रूप लालच रूप विरह का कोई ओर छोर है? इसमें कितनी प्यास है– अरुझे मन सुरझत नहिं कैहूँ । जेहि अँग ढरत होत सुख तैहूँ॥ एकै रुचि दुहुँ में सखि बाढ़ी । परि गई प्रेम ग्रंथि अति गाढ़ी॥