भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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५२ • • हित चौरासी देखत देखत कल नहिं माई । तिनकौं प्रेम कह्यौ नहिं जाई॥ ऐसे रसिक किसोर विहारी। उज्ज्वल प्रेम विहार अहारी॥ अति आसक्त परस्पर प्यारे। एक सुझाव दुहुँनि मन हारे॥ –नेह मंजरी इसी प्रकार और भी– निरखि माधुरी सहज की नैन न मानत हार। बढ़ी तहाँ रुचि की नदी धीरज कूल बिदार॥ छिन छिन औरैं और छबि पल पल में गति और। नागर सागर रूप के परम रसिक सिर मौर॥ कबहुँ लाड़िली होत पिय लाल प्रिया है जात। नहिं जानत यह प्रेम रस निसि दिन कितहिं विहात॥ सुरँग चूनरी एक में रँग भीनें सुकुमार। लपटे ऐसी भाँति सौं नहिं समात बिच हार॥ नैन कटोरी रूप की भरी प्रेम मद मोद। अद्भुत रुचि पीवत बढ़ी आनँद रँग दुहुँ कोद॥ अंगनि की छवि माधुरी निरखत हूँ न अघाहिं। नैन भँवर भूले फिरैं रूप कमल वन माँहिं॥ जद्यपि पिय देखत रहै मन की सोच न जाइ। कैसेहूँ इक बार ये देखें नैन अघाइ॥ अति आसक्त सनेह बस मोहन रूप निधान। तजि स्यानप राख्यो न कछु अपने तन मन प्राँन॥ छिन छिन माँहिं अचेत है पल पल माँहि सचेत। नहिं जानत या रंग में गये कलप जुग केत ॥ नख सिख लौं दोउ अरुझि रहे नेकहुँ सुरझत नाँहिं। ज्यौं ज्यौं रुचि बाढ़ै अधिक त्यौं त्यौं अति अरुझाँहिं॥ –रंग विहार नित्य विहार के केवल चार अंग हैं, जिसमें से नित्य नव किशोरी श्रीराधा एवं नित्य नव किशोर रसिक शेखर प्रियतम श्रीकृष्ण के स्वरूप का बहुत कुछ