हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ५३ परिचयात्मक वर्णन हो चुका है और सखियों के स्वरूप पर भी "उपासना भाव" इस शीर्षक से प्रकाश डाला जा चुका है तथापि सखियों के सुख एवं अधिकार का नित्य विहार में क्या स्वरूप है? यह जानना इस प्रसङ्ग में आवश्यक है। इसका स्पष्टीकरण श्रीध्रुवदास जी इस प्रकार करते हैं- लाल लाड़िली प्रेम ते सरस सखिनु कौ प्रेम। अटकी हैं निजु प्रेम रस तिनहिं न परसत नेम॥ अर्थात् "लाड़िली लाल के प्रेम से भी सरस प्रेम है सखियों का; क्योंकि वे स्वाभाविक एक रस अविच्छिन्न प्रेम में अटक रही हैं, उन्हें नियम स्पर्श नहीं कर पाते, अतः- सखियन के सुख पर सुख नाहीं। आनँद मोद रँगी मन माहीं।। रूप रसासव यहै अहारा। तन मन की कछु नाहिं सँभारा।। एकै रस नित भींजी रहहीं। साँझ भोर समुझयौ नहिं कबहीं।। सो रस करति रहति नित पानैं। निसि बासर बीतत नहिं जानैं।।
- प्रेम लता और भी- सुरत रंग विवि वदन पर श्रम जल कन रहे सोहि। रसिक सखी ललितादि सब छबि अनूप रहीं जोहि।। कोमल अंचल पवन डुलावैं। अति आसक्त नैन भरि आवैं।। एक वैस सब सखी सहेली। मानौ नेह बाग की बेली।। सींची नवल कटाच्छनि जल सौं। फूलीं चाह फूल फल दल सौं।। एक रूप तन मन अनुरागीं। जुगल हेत हित रस सौं पागीं।। -रसानन्द नित्य विहार में जो उज्ज्वलतम महा मधुर रस उच्छलित होता है उसके ठहरने का एक ही स्थान है सखियों का हृदय। श्रीआचार्य्य पाद कहते हैं- निविड़ कानन भवन, बाहु रंजित रवन, सरस आलाप, सुख पुंज बरसावै। उमै संगम सिंधु सुरत पूषन बंधु द्रवत मकरंद हरिवंश अलि पावै।।