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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

५४ • • हित चौरासी और मदन मुदित अंग-अंग बीच-बीच सुरत रंग। पलु पलु हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि।। -हित चौरासी ८१, १७ श्रीध्रुवदासजी कहते हैं कि युगल में उत्पन्न रस कहाँ जाकर ठहरा- प्रेम रसासव छके दोउ करत विलास विनोद। बढ़त रहत उतरत नहीं गौर-स्याम छबि मोद।। मैंड़ तोरि रस चल्यौ अपारा। रही न तन मन कछू सँभारा।। सो रस कहौ कहाँ ठहरानौं। सखियनि के उर नैन समानौं।। तेहि अवलम्ब सबै सहचरी। मत्त रहत ठाढ़ी रँग भरी।।

  • रति मंजरी सखियों के 'मन-नैन' में जाकर रस नित्य स्थिति पाता है अतः ये युगल रस की कोषाध्यक्ष हैं- जुगल प्रेम रस कोष तहाँ की अधिकारिनु जु सहेली।
  • चाचा हित वृन्दावन दास केवल कोषाध्यक्ष ही नहीं हैं, ये सखियाँ इस रस की पूर्ण मार्मिकता की भेदी हैं, चाचाजी कहते हैं- महाभाव दंपति रस बतियाँ समुझत संधि सहेली। कमल गंध कौ अलि ज्यौं मरमी जा उर लगन गहेली।। दादुर मीन चिन्हार न तासौं जदपि रहें नित भेली। वृन्दावन हित रूप जानि ततसुखजुउपास दुलेली।।
  • जुगल सनेह पत्रिका अस्तु; नित्य विहार का चतुर्थ अंग श्रीधाम वृन्दावन है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र का वृन्दावन भूतल स्थित होकर भी सबसे परे है। नित्य एक रस है, आनन्द मय है और प्रेम मय है। यहाँ शुद्ध माधुर्य्य रस की कैशोर लीला नित्य निरन्तर होती रहती है। वृन्दावन का स्वरूप वर्णन करते हुए आचार्य्य पाद ने लिखा है कि-“श्रीराधिका कृपा बिनु सबके मननि अगम्य” है, और-