हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ५५ किं ब्रूमोऽन्यत्र कुण्ठी कृतक जन पदे धाम्न्यपि श्रीविकुण्ठे राधा माधुर्य्यवेत्ता मधुपतिरथ तन्माधुरीं वेत्ति राधा। वृन्दारण्य स्थलीयं परम रस सुधा माधुरीणां धुरीणां तद्द्वन्द्वं स्वादनीयं सकलमपि ददौ राधिका किङ्करीभ्यः॥ –श्रीराधा सुधा निधि १७५; अर्थात् "अन्यत्र की तो बात ही क्या विकुण्ठ धाम की श्री भी (श्रीराधा माधुर्य्य के अभाव से) कुंठित हो गयी है। क्योंकि श्रीराधा के माधुर्य्य को केवल श्रीमाधव जानते हैं और श्रीमाधव के माधुर्य्य को श्रीराधा जानती हैं। इस आस्वादनीय युगल को परम रस-सुधा माधुरी अग्रगण्य श्रीवृन्दारण्य स्थली ने श्रीराधा किङ्करी गणों को सम्पूर्ण रूप से प्रदान कर दिया है। ऐसे वृन्दावन को रसिक जन सर्व त्याग पूर्वक ग्रहण करते हैं; क्योंकि यहाँ श्रीराधा नामक एक दिव्य निधि सदा विराजमान् है जो, सज्जनों को भव से उद्धार करने वाले भाव रूप सुधा रस का प्रवाह है। यह वृन्दावन श्रीराधा करों से स्पर्श की हुई पल्लव-वल्लरी से मण्डित, पदाङ्कों से चिन्हित मनोहर स्थल युक्त एवं श्रीराधा यशोगान से मुखरित मत्त खगावली से सेवित है। यह राधा केलि पुञ्ज का नित्य कुञ्ज कानन है। इस नित्य कानन में श्रीनन्द नन्दन की दर्प युक्त बाहुओं के आलिंगन से शिथिलाङ्गी एवं अनन्त रस-कला विस्तारक घनीभूत आनन्द मूर्ति प्रेम प्रतिमा किशोरी राधा का नित्य निवास है। वृन्दावन के नव लता मन्दिर में तीव्र काम के उन्माद से उन्मादित रति केलि कलाओं के कौतुक-पूर्ण रस स्वरूप एवं आनन्द मय किशोराकृति युगल विराज रहे हैं। यह वन मधुर एवं रस केलि धाम क्यों है ? इस लिये कि इसमें विदग्ध नागरी मणि श्रीराधा एवं रसिक शेखर श्रीकृष्ण कभी गान से, कभी अमन्द हिन्दोल से कभी कुसुम सुरभित वायु से तो कभी सुरत-केलि चातुरी के प्रकाश पूर्वक क्रीड़ा किया करते हैं। यह वृन्दावन साक्षात् राधा रूप है। और अपने राधा रूप से प्रियतम श्रीकृष्ण को अन्य राधा की भाँति अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। कितना साम्य है राधा और श्रीवन में ! श्रीराधा की रोम राजि श्रीवन की यमुना है, अङ्ग